
किसानों के लिए लोन लेना होगा आसान, लोकसभा में पेश हुआ NCDC संशोधन विधेयक
किसानों और छोटे कारोबारियों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। सहकारी समितियों से जुड़े किसानों और सहकारी क्षेत्र में काम करने वाली पात्र संस्थाओं के लिए कर्ज और वित्तीय सहायता का रास्ता आसान करने के उद्देश्य से सरकार ने लोकसभा में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम यानी NCDC संशोधन विधेयक पेश किया है।
इस प्रस्तावित संशोधन का मुख्य उद्देश्य NCDC की वित्तीय सहायता को अधिक सीधा, लचीला और समयबद्ध बनाना है। अभी कई ऐसी संस्थाएं हैं जो सहकारी क्षेत्र में काम करती हैं, लेकिन उन्हें NCDC से सीधे वित्तीय सहायता लेने में कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता है।
नए प्रावधान लागू होने के बाद NCDC केवल सहकारी समितियों तक सीमित नहीं रहेगा। वह सहकारी क्षेत्र में काम करने वाली ऐसी पात्र संस्थाओं को भी सीधे ऋण और अनुदान दे सकेगा, जिनके माध्यम से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल सहकारी समितियों के लाभ के लिए किया जाना हो।
इसका सबसे बड़ा फायदा उन परियोजनाओं को मिल सकता है, जिनके लिए बड़ी पूंजी की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए किसी दुग्ध सहकारी समिति को दूध ठंडा करने का केंद्र बनाना हो, किसान सहकारी समिति को भंडारण या प्रसंस्करण सुविधा तैयार करनी हो या मछली उत्पादन और विपणन से जुड़ा ढांचा विकसित करना हो, तो ऐसी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता का रास्ता आसान हो सकता है।
सरल शब्दों में समझें तो अगर कोई पात्र संस्था सहकारी समितियों के हित में काम कर रही है, तो उसे वित्तीय सहायता पाने के लिए हर बार राज्य सरकार या किसी दूसरी सहकारी संस्था को बीच में लाने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे परियोजनाओं को मंजूरी मिलने और जमीन पर काम शुरू होने में लगने वाला समय कम होने की संभावना है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर किसान को NCDC से सीधे व्यक्तिगत लोन मिल जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था मुख्य रूप से सहकारी समितियों और सहकारी विकास से जुड़ी पात्र संस्थाओं के लिए वित्तीय सहायता का दायरा बढ़ाने पर केंद्रित है। इसलिए किसानों को इसका लाभ मुख्य रूप से अपनी सहकारी समितियों और उनके माध्यम से विकसित होने वाली सुविधाओं के जरिए मिल सकता है।
विधेयक में NCDC को सरकार की मंजूरी से सहकारी समितियों या सहकारी विकास से जुड़ी पात्र संस्थाओं की शेयर पूंजी में हिस्सा लेने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है। यानी NCDC की भूमिका केवल कर्ज देने वाली संस्था तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जरूरत के अनुसार वह कुछ परियोजनाओं में पूंजीगत भागीदारी भी कर सकेगा।
इससे उन सहकारी परियोजनाओं को मजबूती मिल सकती है जिनमें शुरुआत में बड़ी पूंजी की जरूरत होती है। खासकर डेयरी, कृषि भंडारण, प्रसंस्करण, मछली पालन और सहकारी क्षेत्र से जुड़ी अन्य गतिविधियों में इसका महत्व हो सकता है।
सरकार ने 2025-26 से 2028-29 के बीच चार वर्षों में NCDC को ₹2,000 करोड़ का अनुदान देने का फैसला किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस सरकारी सहायता के आधार पर NCDC करीब ₹20,000 करोड़ जुटाकर सहकारी क्षेत्र को कर्ज देने की अपनी क्षमता बढ़ा सकेगा।
अगर यह वित्तीय क्षमता वास्तव में सहकारी क्षेत्र तक प्रभावी तरीके से पहुंचती है, तो इसका फायदा किसानों को कई स्तरों पर मिल सकता है। बेहतर भंडारण व्यवस्था बनने से किसान अपनी उपज को मजबूरी में तुरंत बेचने से बच सकते हैं। प्रसंस्करण इकाइयां बनने से कृषि उत्पादों में वैल्यू एडिशन हो सकता है और डेयरी या मत्स्य क्षेत्र में आधारभूत ढांचा मजबूत होने से किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो सकते हैं।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है। केवल कानून में संशोधन कर देने से किसानों को अपने आप सस्ता और आसान कर्ज नहीं मिलेगा। असली चुनौती यह होगी कि नई व्यवस्था कितनी पारदर्शी, तेज और जमीन पर किसान-केंद्रित तरीके से लागू होती है।
किसानों और सहकारी समितियों को यह भी देखना होगा कि वित्तीय सहायता की प्रक्रिया अनावश्यक कागजी कार्रवाई और लंबी मंजूरी प्रक्रिया में न फंस जाए। अगर उद्देश्य वित्तीय सहायता को सीधा और समयबद्ध बनाना है, तो आवेदन से लेकर ऋण स्वीकृति और राशि जारी होने तक पूरी प्रक्रिया सरल और पारदर्शी होनी चाहिए।
साथ ही छोटे और कमजोर सहकारी संगठनों के लिए भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे केवल बड़े और मजबूत संस्थान ही इसका लाभ न उठा सकें। गांव स्तर की किसान सहकारी समितियां, छोटे डेयरी संगठन, कृषि प्रसंस्करण से जुड़े समूह और अन्य पात्र संस्थाएं भी अपनी आवश्यकता के अनुसार इस वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच सकें, तभी इसका वास्तविक लाभ व्यापक स्तर पर दिखाई देगा।
किसानों के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सहकारिता के माध्यम से सामूहिक आर्थिक ताकत बढ़ाने की संभावना बन सकती है। अकेला किसान भंडारण, प्रसंस्करण या मार्केटिंग के लिए बड़ी पूंजी जुटाने में कठिनाई महसूस कर सकता है, लेकिन मजबूत सहकारी संस्था इन सुविधाओं को सामूहिक रूप से विकसित कर सकती है।
उदाहरण के तौर पर अगर किसी क्षेत्र की किसान सहकारी समिति के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन हों और वह अपनी उपज के लिए गोदाम, ग्रेडिंग, पैकेजिंग या प्रसंस्करण सुविधा तैयार कर सके, तो किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए केवल स्थानीय बिचौलियों पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।
इसी तरह डेयरी क्षेत्र में दूध संग्रह और शीतकरण केंद्र, मत्स्य क्षेत्र में उत्पादन और विपणन का ढांचा तथा कृषि क्षेत्र में भंडारण और प्रसंस्करण जैसी सुविधाएं किसानों की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत कर सकती हैं।
इसलिए NCDC संशोधन विधेयक को केवल एक और वित्तीय कानून के रूप में देखने के बजाय सहकारी क्षेत्र की वित्तीय क्षमता बढ़ाने की कोशिश के रूप में समझना चाहिए। हालांकि इसका वास्तविक असर तभी पता चलेगा जब प्रस्तावित प्रावधान कानून बनने के बाद किस तरह लागू किए जाते हैं और कितनी पात्र संस्थाओं तक वित्तीय सहायता पहुंचती है।
किसानों के लिए अच्छी खबर यह है कि सहकारी क्षेत्र में काम करने वाली पात्र संस्थाओं को सीधे ऋण और अनुदान देने का रास्ता खुल सकता है। लेकिन किसानों के लिए असली फायदा तभी होगा जब यह पैसा कागजों से निकलकर गांव, सहकारी समिति, गोदाम, डेयरी, प्रसंस्करण इकाई और किसान की आर्थिक गतिविधि तक पहुंचे।
कानून बनना पहला कदम है, लेकिन किसान तक लाभ पहुंचना असली परीक्षा होगी।
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