
चीनी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच सरकार के सामने अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है-गन्ने से चीनी बनाई जाए या एथनॉल? अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार गन्ने से एथनॉल उत्पादन को सीमित करने और एथनॉल के लिए मक्का तथा चावल जैसे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। अगर यह फैसला लागू होता है तो इसका असर केवल चीनी की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गन्ना किसानों, चीनी मिलों, एथनॉल उद्योग और देश की कृषि नीति पर भी पड़ेगा।
सबसे पहले उस जमीन की बात करनी जरूरी है जहां इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है। किसान महीनों तक गन्ने की फसल तैयार करता है। खेत में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, कीटनाशक और कटाई-ढुलाई पर खर्च करता है। इसके बाद गन्ना चीनी मिल तक पहुंचता है। किसान के लिए यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि साल भर की आय का एक बड़ा आधार है। इसलिए जब सरकार गन्ने के उपयोग को लेकर कोई बड़ा नीतिगत बदलाव करती है तो उसका असर खेत तक पहुंचना स्वाभाविक है।
पिछले कुछ वर्षों में गन्ने से एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति को ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ाने के बड़े लक्ष्य से जोड़ा गया। इसका तर्क भी मजबूत था। भारत पेट्रोलियम ईंधन के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। अगर देश में उत्पादित एथनॉल को पेट्रोल में मिलाया जाए तो पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घट सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और किसानों के लिए गन्ने तथा अन्य फसलों से अतिरिक्त बाजार तैयार हो सकता है।
लेकिन अब तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आ रहा है। अगर गन्ने और उससे बनने वाले उत्पादों का एक हिस्सा एथनॉल की ओर जाता है तो चीनी उत्पादन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। बाजार में जब आपूर्ति घटती है और मांग बनी रहती है तो कीमत बढ़ने का दबाव बनता है। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक महीने में चीनी की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। यही बढ़ती कीमतें सरकार को अपनी नीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर रही हैं।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चीनी की कीमत नियंत्रित करने के लिए गन्ने से एथनॉल उत्पादन को रोकना या सीमित करना ही स्थायी समाधान है? या फिर सरकार को चीनी, एथनॉल और किसान आय-तीनों के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनानी चाहिए? क्योंकि अगर आज चीनी की कीमत बढ़ रही है और हम एथनॉल कम कर देते हैं, तो इससे तत्काल बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ सकती है, लेकिन इससे एथनॉल उद्योग और ऊर्जा नीति पर क्या असर पड़ेगा, इस सवाल का जवाब भी जरूरी है।
सरकार जिस दूसरे रास्ते पर विचार कर रही है, उसमें मक्का और चावल से एथनॉल बनाने की संभावना महत्वपूर्ण है। मक्का पहले से ही एथनॉल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण फीडस्टॉक बन चुका है। अगर मक्का से बड़े पैमाने पर एथनॉल उत्पादन बढ़ता है तो किसानों के लिए मक्का का बाजार मजबूत हो सकता है। लेकिन यहां भी एक सवाल है-क्या मक्का की इतनी अतिरिक्त उपलब्धता है कि खाद्य और चारे की जरूरत पूरी करने के बाद एथनॉल उद्योग की मांग भी पूरी की जा सके?
भारत में मक्का केवल एथनॉल के लिए इस्तेमाल नहीं होता। पोल्ट्री उद्योग, पशु आहार, स्टार्च उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण में भी इसकी बड़ी मांग है। यदि एथनॉल उद्योग अचानक मक्का की बड़ी मात्रा खरीदने लगे तो मक्का की कीमत बढ़ सकती है। इससे मक्का किसान को लाभ मिल सकता है, लेकिन पोल्ट्री और पशुपालन की लागत भी बढ़ सकती है। अंततः उसका असर अंडे, चिकन, दूध और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। यानी एक फसल को दूसरे स्रोत से बदल देना समस्या का अंत नहीं है; केवल समस्या का स्थान बदल सकता है।
चावल के मामले में स्थिति और भी संवेदनशील है। अगर बड़ी मात्रा में चावल को एथनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा जाता है तो खाद्य सुरक्षा का सवाल उठ सकता है। भारत में करोड़ों लोगों के लिए चावल मुख्य खाद्यान्न है। इसलिए खाद्य उपयोग और औद्योगिक उपयोग के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। एथनॉल नीति ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसमें ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने के प्रयास में खाद्य सुरक्षा पर दबाव आने लगे।
गन्ने के मामले में भी किसान को इस बहस के केंद्र में रखना जरूरी है। जब सरकार गन्ने से एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देती है तो चीनी मिलों के पास गन्ने से वैकल्पिक उत्पाद और राजस्व का एक अतिरिक्त रास्ता खुलता है। इससे मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है और किसानों के गन्ना भुगतान की क्षमता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन अगर अचानक एथनॉल उत्पादन पर प्रतिबंध या सीमा लगा दी जाती है तो चीनी मिलों की अर्थव्यवस्था पर उसका असर कितना होगा, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान को नीतिगत अनिश्चितता का सबसे ज्यादा नुकसान होता है। किसान आज गन्ना इसलिए लगाता है क्योंकि उसे लगता है कि अगले 10 से 12 महीने बाद उसकी फसल का बाजार उपलब्ध रहेगा। अगर नीति बार-बार बदलती है-कभी चीनी उत्पादन बढ़ाने के लिए एथनॉल सीमित, कभी एथनॉल लक्ष्य पूरा करने के लिए गन्ने से एथनॉल बढ़ाना-तो किसान के लिए फसल योजना बनाना मुश्किल हो जाता है।
यहां सरकार को एक दीर्घकालीन और पारदर्शी नीति की जरूरत है। अगर चीनी की कीमतें बढ़ रही हैं तो केवल एथनॉल को जिम्मेदार मानने के बजाय चीनी के पूरे बाजार की समीक्षा होनी चाहिए। उत्पादन कितना है, मिलों के पास कितना स्टॉक है, घरेलू खपत कितनी है, निर्यात कितना हुआ है, किस स्तर पर स्टॉक उपलब्ध है और आने वाले महीनों में उत्पादन की संभावना कितनी है-इन सभी आंकड़ों के आधार पर फैसला होना चाहिए।
उपभोक्ता के लिए भी सस्ती चीनी जरूरी है। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि बहुत कम कीमत पर कृषि उत्पाद बेचने की नीति लंबे समय तक किसानों के हित में नहीं होती। अगर सरकार चीनी की कीमत कम रखने के लिए लगातार उद्योग पर दबाव डालती है और दूसरी तरफ किसान की लागत बढ़ती रहती है, तो भविष्य में किसान गन्ने से दूरी बना सकता है। इसलिए उपभोक्ता को राहत देने और किसान को उचित आय देने के बीच संतुलन जरूरी है।
एथनॉल नीति की सफलता का आकलन भी केवल पेट्रोल में मिश्रण के प्रतिशत से नहीं होना चाहिए। यह देखना होगा कि इससे किसानों को कितना लाभ मिला, चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति कितनी सुधरी, पेट्रोलियम आयात में कितनी बचत हुई, खाद्य कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ा और देश के जल संसाधनों पर इसका कितना दबाव आया। क्योंकि गन्ना पानी की अधिक आवश्यकता वाली फसल है। अगर एथनॉल के लिए गन्ने का उत्पादन लगातार बढ़ता है तो पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में इसका प्रभाव अलग होगा और जल-संकट वाले क्षेत्रों में अलग।
इसी तरह मक्का आधारित एथनॉल को बढ़ावा देने से पहले यह देखना जरूरी है कि देश में मक्का उत्पादन को कितनी तेजी से बढ़ाया जा सकता है। केवल नीति बनाकर मांग पैदा कर देना पर्याप्त नहीं है। बीज, सिंचाई, उत्पादकता, भंडारण, मंडी, परिवहन और प्रसंस्करण की पूरी श्रृंखला तैयार करनी होगी। तभी किसान वास्तव में इसका लाभ उठा पाएगा।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सबक यही है कि कृषि नीति को एक फसल या एक उद्योग के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। गन्ना केवल चीनी नहीं है, चीनी मिल केवल चीनी नहीं बनाती और एथनॉल केवल ईंधन नहीं है। इसके पीछे किसान, मजदूर, मिल, ट्रांसपोर्टर, पेट्रोलियम कंपनियां, उपभोक्ता और सरकार-सभी जुड़े हुए हैं।
अगर सरकार गन्ने से एथनॉल उत्पादन को सीमित करने का फैसला करती है तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि एथनॉल के निर्धारित लक्ष्यों को किस तरह पूरा किया जाएगा। अगर मक्का और चावल से एथनॉल बढ़ाना है तो किसानों को कितनी अतिरिक्त मांग मिलेगी, किस कीमत पर खरीद होगी और खाद्य सुरक्षा को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा। और अगर चीनी की कीमतों को नियंत्रित करना है तो यह भी बताया जाना चाहिए कि किसानों और चीनी मिलों पर इसका बोझ कैसे नहीं डाला जाएगा।
किसानों के लिए सबसे जरूरी चीज केवल आज का भाव नहीं, बल्कि अगले कई वर्षों की नीति की स्पष्टता है। गन्ने का किसान तभी निवेश करेगा जब उसे भरोसा होगा कि सरकार की नीति अचानक नहीं बदलेगी। इसी तरह मक्का किसान भी तभी उत्पादन बढ़ाएगा जब उसे भरोसा होगा कि एथनॉल उद्योग की मांग लंबे समय तक बनी रहेगी।
इसलिए सरकार के सामने चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि चीनी सस्ती कैसे की जाए। असली चुनौती यह है कि चीनी की उपलब्धता, किसान की आय, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और उद्योग की आर्थिक स्थिरता-इन पांचों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। गन्ने से एथनॉल हटाकर मक्का और चावल की ओर जाना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान मानना जल्दबाजी होगी।
किसान आज यह देख रहा है कि नीति किस दिशा में जाती है। चीनी महंगी होगी तो उपभोक्ता परेशान होगा, एथनॉल घटेगा तो ऊर्जा नीति प्रभावित होगी, मक्का की मांग अचानक बढ़ेगी तो दूसरी कृषि लागतें बढ़ सकती हैं और अगर चावल का औद्योगिक उपयोग बहुत बढ़ा तो खाद्य सुरक्षा पर सवाल खड़े हो सकते हैं। इसलिए फैसला आंकड़ों, वैज्ञानिक अध्ययन और जमीन की वास्तविक परिस्थितियों को देखकर होना चाहिए, न कि केवल बाजार में आई एक महीने की तेजी देखकर।
आखिर में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि गन्ने से एथनॉल बनेगा या नहीं। सवाल यह है कि भारत अपनी कृषि अर्थव्यवस्था को ऐसी दिशा में कैसे ले जाए जहां किसान को स्थिर बाजार मिले, उपभोक्ता को उचित कीमत मिले, देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी हों और खाद्य सुरक्षा भी मजबूत बनी रहे। अगर सरकार यह संतुलन बना पाती है तभी एथनॉल नीति वास्तव में सफल मानी जाएगी। वरना एक समस्या को हल करने के प्रयास में दूसरी समस्या पैदा होने का खतरा हमेशा बना रहेगा।
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