
किसान भाइयों, अगर आपके खेत की मिट्टी धीरे-धीरे सख्त होती जा रही है, उसमें पानी का निकास ठीक नहीं है, फसल के बाद मिट्टी भुरभुरी नहीं रहती और खाद डालने के बावजूद उत्पादन पहले जैसा नहीं मिल रहा, तो आपको खेत में मौजूद एक छोटे लेकिन बेहद महत्वपूर्ण जीव पर ध्यान देना चाहिए और वह है केंचुआ। केंचुए को अक्सर किसान खेत का प्राकृतिक मजदूर कहते हैं, क्योंकि यह मिट्टी के अंदर लगातार काम करता है। यह जैविक पदार्थों को तोड़ने में मदद करता है, मिट्टी में सुरंगें बनाता है, जिससे हवा और पानी का आवागमन बेहतर होता है और मिट्टी की संरचना में सुधार आता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि कई खेतों में आज केंचुओं की संख्या पहले की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है। इसका सीधा असर मिट्टी की जैविक गुणवत्ता और लंबे समय में खेती की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
केंचुओं की संख्या कम होने का सबसे बड़ा कारण खेत में जैविक पदार्थों की कमी है। केंचुए मिट्टी में पड़े सड़े-गले जैविक पदार्थ, फसल अवशेष और अन्य कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन आज बहुत से खेतों में गोबर की सड़ी हुई खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और फसल अवशेषों का इस्तेमाल कम हो गया है। किसान धान या गेहूं की कटाई के बाद अवशेषों को खेत में मिलाने के बजाय जला देते हैं या खेत से बाहर निकाल देते हैं। इसका मतलब यह है कि मिट्टी में केंचुओं के लिए भोजन लगातार कम होता जा रहा है। जब भोजन ही नहीं होगा तो केंचुओं की संख्या बढ़ना मुश्किल है।
दूसरी बड़ी समस्या है खेत में रसायनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल। हर कीट दिखाई देने पर तुरंत कीटनाशक का छिड़काव, हर खरपतवार के लिए जरूरत से ज्यादा खरपतवारनाशी और एक ही फसल में बार-बार रसायनों का इस्तेमाल मिट्टी के जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल स्थिति नहीं बनाता। इसका मतलब यह नहीं है कि किसानों को कीटनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। जहां कीट आर्थिक नुकसान की स्थिति तक पहुंच चुका हो, वहां फसल और पंजीकृत लेबल के अनुसार सही दवा, सही मात्रा और सही समय पर इस्तेमाल करना जरूरी है। लेकिन बिना समस्या पहचाने बार-बार छिड़काव करना मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
अगर आप अपने खेत में केंचुओं की संख्या बढ़ाना चाहते हैं तो सबसे पहला काम खेत में जैविक पदार्थ वापस लाना है। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद लगभग 2 से 5 टन प्रति एकड़, खेत की जरूरत और मिट्टी की स्थिति के अनुसार, उपयोग की जा सकती है। यदि पर्याप्त गोबर की खाद उपलब्ध नहीं है तो फसल अवशेषों को उचित तरीके से सड़ाकर कम्पोस्ट बनाएं और खेत में वापस मिलाएं। धान की पराली, गेहूं का भूसा, सूखी पत्तियां और अन्य फसल अवशेष अगर सही तरीके से अपघटित होकर मिट्टी में लौटते हैं तो वे मिट्टी के जैविक पदार्थ को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
हरी खाद भी इस दिशा में बहुत उपयोगी विकल्प हो सकती है। ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसल को उचित अवस्था पर मिट्टी में पलटने से खेत में जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन दोनों की आपूर्ति में मदद मिलती है। लेकिन ध्यान रखें कि जैविक पदार्थ डालने का मतलब यह नहीं कि तुरंत अगले दिन केंचुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाएगी। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसके लिए लगातार कई फसल चक्रों तक मिट्टी का वातावरण सुधारना पड़ता है।
दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है मिट्टी में उचित नमी बनाए रखना। केंचुओं को नमी पसंद होती है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि खेत में हमेशा पानी भरा रहना चाहिए। लगातार जलभराव से मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है और पौधों की जड़ों के साथ-साथ मिट्टी के जीवों के लिए भी प्रतिकूल वातावरण बन सकता है। दूसरी तरफ बहुत लंबे समय तक मिट्टी पूरी तरह सूखी रहने पर केंचुओं की सक्रियता और प्रजनन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सिंचाई और जल निकास का संतुलन बहुत जरूरी है।
इस काम में फसल अवशेषों की मल्चिंग भी मदद कर सकती है। खेत की सूखी घास, पत्तियां या उचित रूप से तैयार फसल अवशेषों की परत मिट्टी की सतह को सीधे धूप और तेज गर्मी से बचाती है तथा नमी के नुकसान को कम करती है। जैसे-जैसे यह जैविक सामग्री सड़ती है, मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ भी जुड़ता है। इस तरह एक ही उपाय से मिट्टी की नमी और केंचुओं के भोजन दोनों में सुधार किया जा सकता है।
तीसरी महत्वपूर्ण बात है अनावश्यक जुताई को कम करना। बहुत अधिक और बार-बार जुताई करने से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना टूट सकती है और मिट्टी में रहने वाले कई जीवों का आवास प्रभावित हो सकता है। रोटावेटर, हैरो या अन्य उपकरणों का इस्तेमाल केवल इसलिए बार-बार न करें कि खेत बिल्कुल पाउडर जैसा दिखाई दे। फसल और मिट्टी की आवश्यकता के अनुसार न्यूनतम या संरक्षण जुताई अपनाने की कोशिश करें। खासकर उन खेतों में जहां मिट्टी की संरचना पहले से अच्छी है, अनावश्यक जुताई से बचना अधिक उपयोगी हो सकता है।
रासायनिक उर्वरकों के मामले में भी संतुलन जरूरी है। यूरिया, डीएपी, पोटाश या अन्य उर्वरकों को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है। फसल को जितने पोषक तत्व चाहिए, उनकी आपूर्ति मिट्टी परीक्षण और फसल की आवश्यकता के आधार पर करनी चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब किसान अनुमान से बहुत ज्यादा मात्रा में उर्वरक डालते हैं। उदाहरण के लिए, केवल यह सोचकर कि ज्यादा यूरिया डालने से ज्यादा उपज मिलेगी, जरूरत से अधिक नाइट्रोजन देना सही रणनीति नहीं है। संतुलित पोषण के साथ जैविक पदार्थों की आपूर्ति करना मिट्टी के दीर्घकालीन स्वास्थ्य के लिए बेहतर तरीका है।
कीटनाशकों के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होता है। अगर फसल में कीट मौजूद है तो पहले उसकी सही पहचान करें। उसके बाद आर्थिक क्षति स्तर, फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि सलाह के आधार पर उपचार करें। किसी भी कीटनाशक की मात्रा केवल सामान्य सलाह देखकर तय नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अलग-अलग उत्पादों में सक्रिय तत्व की सांद्रता अलग हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी उत्पाद पर 20% SC, 50% EC या 75% WG लिखा है तो तीनों को एक समान मात्रा में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हमेशा उत्पाद के लेबल पर दी गई फसल, कीट, मात्रा, पानी की मात्रा और प्रतीक्षा अवधि का पालन करें।
खरपतवारनाशी के मामले में भी जरूरत से ज्यादा मात्रा डालना बहुत बड़ी गलती है। किसान कई बार सोचते हैं कि अगर अनुशंसित मात्रा से ज्यादा दवा डालेंगे तो खरपतवार पूरी तरह खत्म हो जाएगा। लेकिन इससे फसल पर फाइटोटॉक्सिसिटी का खतरा बढ़ सकता है और मिट्टी के जैविक तंत्र पर भी अनावश्यक दबाव पड़ सकता है। इसलिए उदाहरण के लिए यदि किसी उत्पाद की अनुशंसित मात्रा 400 मिलीलीटर प्रति एकड़ है तो केवल अनुमान से उसे 600 या 800 मिलीलीटर करना सही नहीं है। सही मात्रा हमेशा संबंधित उत्पाद के पंजीकृत लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से तय होनी चाहिए।
अगर किसी खेत में केंचुए लगभग दिखाई ही नहीं देते हैं तो बाहर से केंचुए लाने का विचार भी कुछ किसान अपनाते हैं। लेकिन केवल केंचुए खरीदकर खेत में छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। अगर खेत में जैविक पदार्थ नहीं है, मिट्टी बहुत सूखी रहती है, लगातार जलभराव होता है या रसायनों का अत्यधिक इस्तेमाल होता है, तो बाहर से लाए गए केंचुए भी लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगे। इसलिए पहले खेत का वातावरण सुधारना जरूरी है। यदि वर्मी कम्पोस्ट इकाई से केंचुए प्राप्त किए जा रहे हैं तो स्वस्थ और उपयुक्त प्रजाति तथा विश्वसनीय स्रोत का चयन करें।
यह भी समझना जरूरी है कि केंचुए की संख्या हर खेत में एक जैसी नहीं हो सकती। मिट्टी का प्रकार, जैविक कार्बन, नमी, तापमान, फसल प्रणाली और प्रबंधन पद्धति के अनुसार इनकी संख्या बदलती रहती है। इसलिए केवल एक दिन खेत खोदकर कुछ केंचुए मिल गए या नहीं मिले, इसी आधार पर मिट्टी को स्वस्थ या खराब घोषित नहीं किया जा सकता। लगातार 2 से 3 फसल चक्रों तक खेत में जैविक पदार्थ, नमी प्रबंधन और कम जुताई जैसी व्यवस्थाओं को अपनाने के बाद बदलाव को देखना ज्यादा सही तरीका है।
किसान भाइयों, एक बात हमेशा याद रखिए कि मिट्टी केवल रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का मिश्रण नहीं है। यह एक जीवित तंत्र है, जिसमें सूक्ष्मजीव, केंचुए और दूसरे जीव लगातार काम करते रहते हैं। जब हम खेत में जैविक पदार्थ वापस देते हैं, फसल अवशेषों को मिट्टी में लौटाते हैं, हरी खाद का इस्तेमाल करते हैं, उचित नमी बनाए रखते हैं, अनावश्यक जुताई कम करते हैं और कीटनाशकों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करते हैं, तो धीरे-धीरे मिट्टी का वातावरण बेहतर होने लगता है।
केंचुए को बढ़ाना कोई एक दिन का उपाय नहीं है और न ही कोई ऐसी दवा है जिसे डालते ही खेत में हजारों केंचुए पैदा हो जाएं। यह मिट्टी के पूरे प्रबंधन को सुधारने की प्रक्रिया है। अगर आप लगातार 1 से 3 वर्षों तक जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाते हैं, फसल अवशेषों को खेत में वापस लाते हैं, पानी का सही प्रबंधन करते हैं और रसायनों का इस्तेमाल केवल आवश्यकता और अनुशंसित मात्रा के अनुसार करते हैं, तो मिट्टी की संरचना और जैविक गतिविधि में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
इसलिए अगली बार जब आप अपने खेत में केंचुआ देखें तो उसे केवल एक छोटा जीव समझकर नजरअंदाज मत कीजिए। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आपकी मिट्टी में जैविक गतिविधि मौजूद है। लेकिन लक्ष्य केवल केंचुओं की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य ऐसी स्वस्थ मिट्टी बनाना होना चाहिए जिसमें जैविक पदार्थ, पोषक तत्व, हवा, पानी और सूक्ष्मजीवों का संतुलन बना रहे। स्वस्थ मिट्टी ही लंबे समय तक स्वस्थ फसल और स्थिर उत्पादन की नींव बनती है।
अगर आपके खेत में केंचुए लगातार कम हो रहे हैं, तो आज से ही तीन चीजों पर काम शुरू कीजिए। पहली, जैविक पदार्थ बढ़ाइए। दूसरी, मिट्टी में नमी और जल निकास का संतुलन रखिए। तीसरी, अनावश्यक जुताई और जरूरत से ज्यादा रसायनों के इस्तेमाल को कम कीजिए। गोबर की सड़ी खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और फसल अवशेषों को खेत में वापस लाने की आदत बनाइए। यही छोटे-छोटे बदलाव आने वाले वर्षों में आपकी मिट्टी की उर्वरता, संरचना और खेती की लागत पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो इसे दूसरे किसान भाइयों तक जरूर पहुंचाइए, क्योंकि अच्छी खेती की शुरुआत केवल अच्छी फसल से नहीं, बल्कि स्वस्थ मिट्टी से होती है।
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