
किसानों के हिस्से की खाद अगर दूसरे राज्य भेजी जा रही है, तो सवाल सिर्फ 100 कट्टे DAP का नहीं, पूरी व्यवस्था की निगरानी का है।
राजस्थान के सवाई माधोपुर से सामने आया मामला किसानों के लिए गंभीर चिंता पैदा करता है। छाण पुलिस चौकी पर तिरपाल से ढकी एक पिकअप को रोककर जांच की गई तो उसमें करीब 100 कट्टे DAP खाद मिले। कृषि विभाग की जांच में खाद को मध्यप्रदेश ले जाने की बात सामने आने के बाद पिकअप चालक, मध्यप्रदेश निवासी व्यक्ति और खाद विक्रेता समेत तीन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई।
सवाल यह है कि जब खाद की उपलब्धता को लेकर किसान परेशान हैं, तब इतनी बड़ी मात्रा में DAP जिले से बाहर कैसे जा रही थी?
किसानों को खाद के लिए घंटों लाइन में लगना पड़ता है। कई जगह स्टॉक खत्म होने की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे माहौल में अगर 100-100 कट्टों की खेप दूसरे राज्य भेजे जाने लगे, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे कि खाद की सप्लाई चेन में आखिर कहां और कैसे गड़बड़ी हो रही है।
बताई गई जानकारी के अनुसार, पिकअप चालक से पूछताछ में खाद को मध्यप्रदेश के जावदेश्वर गांव निवासी व्यक्ति तक पहुंचाने की बात सामने आई। कृषि विभाग की जांच में यह खाद सवाई माधोपुर शहर स्थित एक खाद विक्रेता की दुकान से खरीदी जाना बताया गया है। इसके बाद विभाग की ओर से तीन लोगों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया गया।
यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल खाद के परिवहन तक सीमित नहीं है। जांच का असली मुद्दा यह होना चाहिए कि यह खाद किसके नाम पर खरीदी गई, किस रिकॉर्ड में दर्ज हुई, किस किसान या संस्था के लिए आवंटित थी और आखिर मध्यप्रदेश तक पहुंचाने की नौबत क्यों आई?
अगर खाद वास्तव में अवैध रूप से दूसरे राज्य भेजी जा रही थी, तो केवल वाहन पकड़ना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। पूरी सप्लाई चेन की जांच होनी चाहिए। दुकान का स्टॉक रजिस्टर, बिक्री रिकॉर्ड, बिल, POS मशीन का डेटा, खरीदारों का विवरण और परिवहन से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जानी चाहिए।
क्योंकि एक सवाल बहुत बड़ा है-अगर खाद दुकान से निकली, तो रिकॉर्ड में उसकी बिक्री किसके नाम हुई?
किसानों का आरोप है कि तिरपाल से ढकी पिकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के जरिए खाद को जिले से बाहर ले जाया जाता है। यदि ऐसे आरोप लगातार सामने आ रहे हैं तो प्रशासन को केवल नाकाबंदी के दौरान वाहन पकड़ने के बजाय सप्लाई चेन की निगरानी भी मजबूत करनी होगी।
यह भी सामने आया है कि पिछले महीने बहरावंडा खुर्द चौकी पर एक पिकअप से करीब 100 कट्टे यूरिया पकड़े गए थे और प्रारंभिक जांच में उसे भी मध्यप्रदेश की ओर ले जाने की बात सामने आई थी। यदि अलग-अलग घटनाओं में एक जैसी स्थिति सामने आ रही है, तो इसे केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय पूरे नेटवर्क और वितरण व्यवस्था की जांच की जरूरत है।
हालांकि, किसी व्यक्ति या विक्रेता को दोषी मानने से पहले जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। FIR दर्ज होना आरोपों की जांच की शुरुआत है, अंतिम दोषसिद्धि नहीं। लेकिन प्रशासन के लिए यह निश्चित रूप से एक संकेत है कि खाद की आवाजाही और वितरण व्यवस्था पर अधिक कड़ी निगरानी की आवश्यकता है।
सबसे ज्यादा नुकसान किसे होता है? किसान को।
जब स्थानीय बाजार में खाद की उपलब्धता कम होती है, तो किसान को लाइन में लगना पड़ता है। समय पर खाद नहीं मिली तो फसल प्रबंधन प्रभावित होता है। और यदि किसान मजबूरी में महंगे दाम पर खाद खरीदता है, तो उसकी खेती की लागत बढ़ जाती है।
सरकार यदि किसानों को निर्धारित दर पर खाद उपलब्ध कराने की बात करती है, तो यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि आवंटित खाद सही जगह और सही लाभार्थियों तक पहुंचे।
इसके लिए कुछ सवालों के जवाब प्रशासन को सार्वजनिक रूप से देने चाहिए-
100 कट्टे DAP किस स्टॉक से निकली थी?
विक्रेता के रिकॉर्ड में इसकी बिक्री किसके नाम दर्ज थी?
क्या POS मशीन में इन 100 कट्टों की बिक्री दर्ज हुई थी?
खाद को दूसरे राज्य ले जाने की अनुमति किस आधार पर थी?
क्या इससे पहले भी इसी दुकान या संबंधित लोगों के माध्यम से खाद की ऐसी खेप भेजी गई थी?
जिले से बाहर खाद के अवैध परिवहन की निगरानी के लिए क्या व्यवस्था है?
और सबसे महत्वपूर्ण-
जब स्थानीय किसान खाद के लिए परेशान हैं, तो इतनी बड़ी मात्रा में खाद जिले से बाहर कैसे निकल गई?
सवाई माधोपुर में हुई यह कार्रवाई अगर निष्पक्ष और व्यापक जांच तक पहुंचती है, तो इससे खाद की कालाबाजारी और अवैध परिवहन पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। लेकिन कार्रवाई केवल एक पिकअप और तीन आरोपियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी जांचना जरूरी है कि इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क तो काम नहीं कर रहा।
किसानों के हिस्से की खाद किसी भी कीमत पर अवैध व्यापार का माध्यम नहीं बननी चाहिए। खाद का वितरण पारदर्शी हो, स्टॉक की ऑनलाइन और भौतिक निगरानी हो, बिक्री रिकॉर्ड की नियमित जांच हो और जहां अनियमितता मिले वहां तत्काल कार्रवाई हो।
किसान खाद के लिए लाइन में खड़ा हो और उसी जिले से खाद की खेप दूसरे राज्य चली जाए-अगर यह सच है तो यह सिर्फ किसान की परेशानी नहीं, बल्कि पूरी वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
अब जरूरत है कि प्रशासन इस मामले की तह तक जाए और किसानों को यह भरोसा दिलाए कि उनके हिस्से की खाद किसी भी हालत में अवैध तरीके से बाहर नहीं जाएगी।
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