
धान की फसल में इस समय सबसे महत्वपूर्ण अवस्था चल रही है। जिन किसानों ने समय से धान की रोपाई या बोनी की है, उनकी फसल लगभग 20 से 21 दिन की अवस्था में पहुंच चुकी है और खेत में कल्ले यानी कंसे तेजी से निकलने शुरू हो गए हैं। जिन किसानों ने देर से रोपाई या बोनी की है, उनकी फसल अगले 7 से 10 दिनों में इसी अवस्था में पहुंच जाएगी। यही वह समय है जब किसान को सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इसी अवधि में पौधे में कल्लों का फुटाव तेजी से होता है। अगर इस समय पोषण सही मिला तो अधिक स्वस्थ कल्ले बनेंगे, उन्हीं में अधिक प्रभावी बालियां आएंगी और आगे चलकर दानों की संख्या तथा उपज बढ़ाने में मदद मिलेगी।
धान में अधिक कल्ले प्राप्त करने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात 20 से 21 दिन की अवस्था में दी जाने वाली पहली यूरिया की खुराक है। इस समय केवल पत्तियों का रंग देखकर यूरिया नहीं डालना चाहिए, बल्कि फसल की अवस्था को ध्यान में रखना चाहिए। दिए गए स्रोत के अनुसार सामान्य धान में इस अवस्था पर लगभग 40 से 50 किलोग्राम दानेदार यूरिया प्रति एकड़ देने की बात कही गई है। यहां दानेदार यूरिया की बात है, न कि पहली खुराक के रूप में नैनो यूरिया की। इसका कारण यह बताया गया है कि 20 से 21 दिन की अवस्था में खेत में पौधों की छतरी अभी पूरी तरह नहीं बनी होती और पौधों के बीच जमीन दिखाई देती है। ऐसी स्थिति में नैनो यूरिया का छिड़काव करने पर उसका कुछ हिस्सा पौधों तक पहुंचने के बजाय जमीन पर जा सकता है। इसलिए इस अवस्था पर दानेदार यूरिया को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
अगर आपकी फसल हाइब्रिड धान की है, जैसे स्रोत में बताए गए हाइब्रिड उदाहरणों की तरह, तो सामान्य धान की तुलना में यूरिया की मात्रा लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की सलाह दी गई है। यानी जहां सामान्य फसल में 50 किलोग्राम यूरिया दिया जा रहा है, वहां हाइब्रिड फसल में लगभग 60 किलोग्राम तक की मात्रा की बात कही गई है। इसी तरह 40 किलोग्राम वाली मात्रा को बढ़ाकर लगभग 50 किलोग्राम किया जा सकता है। लेकिन यह बात विशेष रूप से हाइब्रिड धान की फसल के संदर्भ में है। किसान को अपनी फसल की अवस्था और पहले दी गई खाद को ध्यान में रखना चाहिए। बहुत जल्दी, यानी 15 दिन के आसपास ही भारी यूरिया देने से भी अपेक्षित कल्ले नहीं बन सकते और बहुत देर करने पर भी कल्ले निकलने की महत्वपूर्ण अवस्था प्रभावित हो सकती है।
पहली यूरिया की खुराक के साथ जिंक का महत्व भी बहुत ज्यादा बताया गया है। अगर खेत में जिंक यानी जस्ता की कमी है और किसान केवल यूरिया डालता रहता है तो पौधे को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता। जिंक पौधे की वृद्धि और कई महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। इसलिए यदि रोपाई या बोनी के समय जिंक नहीं दिया गया है तो 20 से 21 दिन की इस अवस्था में जिंक सल्फेट देने की सलाह दी गई है। 33 प्रतिशत जिंक वाले दानेदार जिंक सल्फेट की मात्रा लगभग 5 किलोग्राम प्रति एकड़ और 21 प्रतिशत जिंक वाले जिंक सल्फेट की मात्रा लगभग 10 किलोग्राम प्रति एकड़ बताई गई है। इसे दानेदार यूरिया के साथ मिलाकर खेत में देने का भी उल्लेख किया गया है।
जिंक का एक दूसरा विकल्प नैनो जिंक बताया गया है। यदि किसान तत्काल पत्तियों के माध्यम से जिंक की पूर्ति करना चाहता है तो नैनो जिंक का प्रयोग किया जा सकता है। दिए गए स्रोत में 1 मिलीलीटर नैनो जिंक प्रति लीटर पानी की दर बताई गई है। यानी 15 लीटर की टंकी में 15 मिलीलीटर और 20 लीटर की टंकी में 20 मिलीलीटर नैनो जिंक लिया जा सकता है। इस हिसाब से एक एकड़ में इस्तेमाल होने वाले पानी की मात्रा और उत्पाद के लेबल निर्देश को ध्यान में रखना जरूरी है। स्प्रे करते समय फ्लैट फैन नोजल का उपयोग करने की सलाह दी गई है ताकि घोल पत्तियों पर अच्छी तरह पहुंचे और अनावश्यक रूप से जमीन पर न गिरे।
स्रोत में जिंक को केवल कल्ले निकलने से ही नहीं बल्कि आगे दाने भरने की प्रक्रिया से भी जोड़ा गया है। बताया गया है कि धान की बाद की अवस्था में जिंक की कमी रहने पर बालियों में दानों का भराव प्रभावित हो सकता है और कुछ दाने कमजोर या खाली रह सकते हैं। इसी वजह से यदि किसान पहली खुराक के समय जिंक देने से चूक गया है तो बाद की अवस्था में भी इसकी पूर्ति पर ध्यान देने की बात कही गई है।
इसके बाद 35 से 40 दिन की अवस्था आती है। इस समय तक खेत में पर्याप्त कल्ले निकल चुके होते हैं और अब उन कल्लों को आगे बढ़ाकर प्रभावी बालियां प्राप्त करने की दिशा में काम करना होता है। इस अवस्था पर दूसरी यूरिया की खुराक देने की बात कही गई है, लेकिन पहली खुराक की तुलना में यह खुराक हल्की रखने पर जोर दिया गया है। स्रोत के अनुसार इस समय अत्यधिक यूरिया देने से पौधे का रंग जरूरत से ज्यादा गहरा हरा हो सकता है, पौधे में अत्यधिक नरम बढ़वार हो सकती है और माहू, तना छेदक तथा कुछ रोगों के प्रकोप का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए 35 से 40 दिन पर नाइट्रोजन की दूसरी खुराक को नियंत्रित रखना जरूरी बताया गया है।
इसी अवस्था में नैनो यूरिया के उपयोग की बात कही गई है। स्रोत के अनुसार पहली खुराक में दानेदार यूरिया देने के बाद 35 से 40 दिन की अवस्था में नैनो यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है, क्योंकि इस समय तक पौधों की पत्तियां और छतरी काफी विकसित हो चुकी होती हैं। इससे पत्तियों के माध्यम से पोषक तत्व पहुंचाने का उद्देश्य बताया गया है। यहां भी किसान को अपने इस्तेमाल किए जा रहे उत्पाद के लेबल पर लिखी मात्रा के अनुसार ही नैनो यूरिया का प्रयोग करना चाहिए।
अगर किसान ने 20 से 21 दिन की अवस्था में जिंक नहीं दिया था तो 35 से 40 दिन पर जिंक की कमी की तत्काल पूर्ति के लिए पत्तियों पर नैनो जिंक देने की बात स्रोत में कही गई है। इस समय दानेदार जिंक सल्फेट को दोबारा खेत में डालने के बजाय पत्तियों के माध्यम से जिंक देने पर जोर दिया गया है। नैनो जिंक उपलब्ध न होने पर चिलेटेड जिंक का भी उल्लेख किया गया है। स्रोत के अनुसार लगभग 100 ग्राम चिलेटेड जिंक एक एकड़ में छिड़काव के लिए पर्याप्त बताया गया है। चिलेटेड जिंक में जिंक को ऐसी अवस्था में रखा जाता है जिससे पौधा उसे पत्तियों के माध्यम से आसानी से ग्रहण कर सके।
अब बात आती है गोभ या घुट की अवस्था की, जिसे धान की फसल में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समय पौधे के अंदर बालियों का विकास हो रहा होता है और आगे दाने बनने की प्रक्रिया के लिए पोषण की जरूरत होती है। स्रोत में बताया गया है कि यदि इस अवस्था में पोटाश, जिंक और सल्फर की कमी हो जाए तो बालियों में दाने पूरी तरह नहीं भरते। ऊपर और नीचे के हिस्से में दाने कमजोर रह सकते हैं और किसान को ऐसी बालियां दिखाई दे सकती हैं जिनमें बीच-बीच में दाने हैं लेकिन पूरी बाली अच्छी तरह भरी हुई नहीं है।
इस अवस्था पर पोटाश के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है। स्रोत में गोभ की अवस्था में लगभग 15 से 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ देने की सलाह दी गई है। इसका उद्देश्य दानों के भराव में मदद करना और पौधे को मजबूती देना बताया गया है। इसी समय अनावश्यक यूरिया देने से बचने की सलाह दी गई है। स्रोत के अनुसार गोभ की अवस्था में यूरिया देने से पौधे में अनावश्यक हरापन और कोमल बढ़वार बढ़ सकती है तथा ब्लास्ट जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए इस अवस्था में जरूरत के अनुसार पोटाश और जिंक पर ध्यान देने की बात कही गई है।
धान में केवल यूरिया बढ़ाते जाना उपज बढ़ाने का रास्ता नहीं है। अगर किसान 20 से 21 दिन पर सही समय से नाइट्रोजन देता है, जिंक की कमी को पूरा करता है, 35 से 40 दिन पर दूसरी खुराक को नियंत्रित रखता है और गोभ की अवस्था में पोटाश की जरूरत पूरी करता है तो फसल में कल्ले, बालियां और दाने के विकास को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। साथ ही खेत में पानी का प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है। खाद देने के बाद खेत की स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि पोषक तत्व पौधे को मिल सकें और जड़ों की सक्रियता बनी रहे।
किसान भाइयों, सबसे जरूरी बात यह है कि खेत में सिर्फ कल्लों की संख्या देखकर खुश नहीं होना है। हमारा लक्ष्य अधिक से अधिक स्वस्थ और प्रभावी कल्ले बनाना है, क्योंकि हर कल्ला जरूरी नहीं कि आगे चलकर प्रभावी बाली बने। अच्छी फसल में कल्ले मजबूत हों, उनमें बालियां अच्छी निकलें और बालियों में ऊपर से नीचे तक दाने अच्छी तरह भरें, तभी उपज का वजन बढ़ेगा। इसलिए 20 से 21 दिन, 35 से 40 दिन और गोभ की अवस्था को अलग-अलग समझकर खाद और पोषक तत्वों का प्रबंधन करना बहुत जरूरी है।
इस पूरे प्रबंधन में मुख्य रूप से पहली अवस्था पर दानेदार यूरिया लगभग 40 से 50 किलोग्राम प्रति एकड़, जिंक की कमी होने पर 33 प्रतिशत जिंक सल्फेट लगभग 5 किलोग्राम या 21 प्रतिशत जिंक सल्फेट लगभग 10 किलोग्राम प्रति एकड़, नैनो जिंक के लिए स्रोत में 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर, 35 से 40 दिन पर नैनो यूरिया का छिड़काव और गोभ की अवस्था में लगभग 15 से 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की बात कही गई है। इन मात्राओं को फसल की अवस्था, उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार लागू करना चाहिए।
धान की अच्छी उपज के लिए किसान भाई एक बात हमेशा याद रखें कि खाद की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका सही समय और सही संतुलन है। शुरुआत में कल्ले निकालने के लिए नाइट्रोजन और जिंक, बीच की अवस्था में नियंत्रित पोषण और गोभ की अवस्था में दाने भरने तथा पौधे को मजबूत रखने के लिए पोटाश और आवश्यक पोषक तत्वों पर ध्यान देना चाहिए। अगर किसान इन तीनों महत्वपूर्ण अवस्थाओं को सही तरीके से संभाल लेता है तो कम खर्च में फसल की उत्पादन क्षमता को बेहतर करने की दिशा में काम किया जा सकता है।