फेसबुक पोस्ट के माध्यम से मैं देख रहा हूँ कि धानापुर में चल रही रामकथा से कुछ लोग इसलिए नाराज हैं, क्योंकि उन्हें मंच पर जगह नहीं मिल पा रही है।
आखिर कैसी मानसिकता है यह, जहाँ भगवान की कथा से ज्यादा महत्व मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का हो गया है?
एक तरफ मंच पर बैठने की चाहत और दूसरी तरफ हजारों श्रद्धालु, जो खड़े होकर या जमीन पर बैठकर भी बिना किसी द्वेष, अहंकार या हीनभावना के पूरी श्रद्धा से कथा सुन रहे हैं।
उन सभी श्रद्धालुओं की आस्था को मेरा सादर प्रणाम। 🙏🚩
याद रखिए, मंच पर बैठने से कोई बड़ा नहीं होता, बड़ा होता है उसका विचार, व्यवहार और समर्पण।
अगर मंच पर जाना है, तो खुद को उस योग्य बनाइए। और अगर सच्चे मन से भगवान पर भरोसा है, तो धैर्य रखिए। जब सही समय और संयोग बनेगा, मंच भी मिलेगा और सम्मान भी।
भगवान की कथा में श्रोता बनना भी सौभाग्य है, हर किसी को मंच ही चाहिए—यह कैसी भक्ति और कैसी सोच है? 🙏🚩
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