पटवारी साहब का नया नियम: फोन उठाना है या नहीं, यह भी अब ‘मन की सरकार’ तय करेगी!
छतरपुर। जिले में ग्रामीणों की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई पटवारियों से संपर्क करना किसी सरकारी कार्यालय से काम कराने से कम मुश्किल नहीं है। फोन लगाया तो उठेगा या नहीं—यह पटवारी साहब के मूड पर निर्भर बताया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि कुछ पटवारियों का तर्क है—“हम ग्रामीणों का फोन क्यों उठाएं? मन होगा तो उठाएंगे, नहीं होगा तो नहीं उठाएंगे।” अब सवाल यह है कि जब जमीन, मकान और राजस्व संबंधी काम के लिए ग्रामीणों को पटवारी की जरूरत पड़ती है, तो आखिर संपर्क का रास्ता क्या हो?
दूसरी तरफ, कुछ पटवारियों की ओर से पत्रकारों पर भी आरोप लगाए जाने की बात सामने आ रही है कि “पत्रकार पैसे लेकर खबरें चलाते हैं।” सवाल यह है कि यदि ऐसा कोई आरोप है तो क्या संबंधित पटवारी इसके समर्थन में कोई ठोस प्रमाण भी सार्वजनिक करेंगे?
क्योंकि पत्रकार जब कैमरा लेकर पटवारियों की मांगों और समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने के लिए उनके सामने खड़े होते हैं, उनकी खबरें चलाते हैं और उनकी आवाज प्रशासन तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं, तो उन्हीं पत्रकारों पर पैसे लेकर खबर चलाने का आरोप लगना अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करता है।
अब जरा दूसरा पहलू भी देखिए। ग्रामीणों की शिकायतें लेकर हर मंगलवार कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचने की तस्वीरें और शिकायतें सामने आती रहती हैं। कहीं जमीन या मकान के रिकॉर्ड को लेकर विवाद, कहीं निजी जमीन के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होने की शिकायत तो कहीं सरकारी जमीन के रिकॉर्ड को लेकर सवाल उठते हैं।
ऐसे में अगर कोई गरीब किसान या मजदूर पटवारी को फोन करता है और उसे जवाब मिले कि “फोन उठाना हमारी मर्जी है”, तो फिर ग्रामीण अपनी समस्या लेकर जाएं तो जाएं कहां?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर पत्रकार पटवारियों की मांगों को लेकर खबर चलाते हैं, तो क्या वह खबर इसलिए गलत हो जाती है क्योंकि उससे किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है?
पटवारी साहबों से भी एक छोटा-सा सवाल है—
अगर पत्रकार पैसे लेकर खबरें चलाते हैं, तो नाम बताइए, प्रमाण दिखाइए और शिकायत कीजिए।
लेकिन अगर प्रमाण नहीं हैं, तो क्या पूरे पत्रकार समाज पर ऐसा आरोप लगाना उचित है?
और पत्रकारों से भी सवाल है—अगर आप पटवारियों की समस्याओं पर खबर चला रहे हैं, तो क्या अब आपको यह भी बताना पड़ेगा कि खबर चलाने के बदले किससे कितने पैसे लिए?
क्योंकि लोकतंत्र में खबर का जवाब सबूत से दिया जाता है, आरोप से नहीं।
अब छतरपुर की जनता भी जानना चाहती है—पटवारी ग्रामीणों का फोन उठाएंगे, उनकी शिकायतें सुनेंगे और रिकॉर्ड की गलतियों को सुधारेंगे या फिर हर सवाल का जवाब सिर्फ यही होगा—“मन होगा तो करेंगे!”