एक तरफ अपने हक और मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने वाले छात्रों पर लाठीचार्ज किया जा रहा है, आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे हैं और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर झारखंड तक छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। झारखंड में विधानसभा मार्च के दौरान छात्रों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल की खबर सामने आई है।
लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह भी है कि जब धार्मिक यात्राओं और जुलूसों के दौरान कुछ लोग खुलेआम तलवार, त्रिशूल या दूसरे हथियार लेकर सड़कों पर नजर आते हैं, तो उनके मामले में कानून का पालन किस तरह कराया जाता है?
क्या धार्मिक आस्था कानून से ऊपर है?
अगर किसी व्यक्ति के पास ऐसा हथियार है, जिसे रखना या सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना कानून या स्थानीय प्रशासन के आदेशों के खिलाफ है, तो कार्रवाई का आधार क्या होगा? और अगर पुलिस हथियार जब्त करने के बाद व्यक्ति को छोड़ देती है तो इसकी वजह क्या है?
कानून की नजर में प्रदर्शनकारी छात्र हो या किसी धार्मिक यात्रा में शामिल व्यक्ति—कानून का सिद्धांत समान होना चाहिए।
सवाल किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है।
सवाल सिर्फ इतना है—
क्या कानून सबके लिए बराबर है??????
अगर छात्रों के प्रदर्शन में कानून-व्यवस्था का हवाला देकर सख्ती की जाती है, तो हथियारों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी वही कानून और वही मापदंड लागू क्यों नहीं होने चाहिए?
प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि हथियार लेकर सार्वजनिक रूप से चलने वालों के लिए क्या नियम हैं और उनका उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई की जाती है।
क्योंकि लोकतंत्र में कानून की ताकत तभी भरोसा पैदा करती है, जब उसका इस्तेमाल बिना भेदभाव और समान रूप से किया जाए।
Korba, Korba | Aug 11, 2026