#हनुमानगढ़ में घग्गर नदी के पेट में मिट्टी की भर्ती… और शहर की खामोशी क्यों?
संगरिया की आवाज़।
पूरे देश और प्रदेश में इन दिनों नदी, नालों, जोहड़ों और पायतन की भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त करवाने का प्रयास चल रहा है। उद्देश्य साफ है—नदियों को चौड़ा किया जाए, नालों का प्राकृतिक प्रवाह सुचारू हो, जलभराव की समस्या कम हो और गांवों के जोहड़ों को पुनर्जीवित किया जा सके।
लेकिन इसी बीच हनुमानगढ़ जिले की घग्गर नदी, जिसे प्राचीन सरस्वती नदी से भी जोड़ा जाता है, को लेकर एक बेहद गंभीर सवाल सामने खड़ा है।
घग्गर नदी के अंदर, दीवार के पीछे चुपचाप मिट्टी की भर्ती चल रही है… और शहर खामोशी से सब कुछ देख रहा है।
सवाल यह नहीं है कि मिट्टी कौन डाल रहा है?
सवाल यह है कि मिट्टी डालने की अनुमति किसने दी?
कौन सा विभाग इसके आदेश दे रहा है?
किस नियम के तहत नदी की भूमि को भरा जा रहा है?
अगर यह किसी की निजी भूमि थी तो फिर इसके आगे पुल की दीवार क्यों बनाई गई थी?
अगर यह नदी की भूमि नहीं थी तो तटबंध यहां तक क्यों बनाया गया था?
और अगर यह नदी का हिस्सा था, तो फिर आज इसे मिट्टी डालकर भरने की अनुमति किस आधार पर दी जा रही है?
सबसे बड़ा सवाल—क्या नदी, नाले, जोहड़ और पायतन की भूमि को बचाने के लिए बनाए गए तमाम नियम और सरकारी आदेश हनुमानगढ़ में लागू नहीं होते?
एक तरफ जंगलों और सरकारी जमीनों से कब्जे हटाने की कार्रवाई की जा रही है।
दूसरी तरफ शहर के बीचोंबीच घग्गर नदी के क्षेत्र में मिट्टी की भर्ती होती दिखाई दे रही है।
क्या नदी-नालों के लिए कानून अलग है और बाकी सरकारी जमीन के लिए अलग?
या फिर यहां भी आंकड़ों की जादूगरी में करोड़ों रुपए की बेशकीमती जमीन का खेल होने वाला है?
आज जरूरत किसी पर सीधे आरोप लगाने की नहीं, बल्कि पूरे मामले की निष्पक्ष और सार्वजनिक जांच की है।
जनता जानना चाहती है—
👉 यह जमीन किसकी है?
👉 राजस्व रिकॉर्ड में इसका दर्जा क्या है?
👉 घग्गर नदी की वास्तविक सीमा कहां तक है?
👉 यहां मिट्टी डालने की अनुमति किस विभाग ने दी?
👉 अनुमति किस अधिकारी ने जारी की?
👉 किस नियम और किस आदेश के तहत दी गई?
👉 क्या जल संसाधन विभाग, राजस्व विभाग या नगर निकाय से इसकी अनुमति ली गई?
👉 अगर अनुमति नहीं है तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
👉 नदी के प्राकृतिक बहाव और भविष्य के जलभराव पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
👉 क्या इस भूमि का भू-उपयोग बदला गया है?
👉 और सबसे महत्वपूर्ण—क्या करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति को धीरे-धीरे निजी लाभ की जमीन में बदलने की तैयारी तो नहीं?
हनुमानगढ़ की जनता को इन सवालों के जवाब चाहिए।
और सवाल सिर्फ प्रशासन से नहीं है।
तथाकथित जागरूक लोग कहां हैं?
पत्रकार कहां हैं?
यूट्यूब चैनल कहां हैं?
डिजिटल मीडिया कहां है?
सोशल मीडिया के तथाकथित जागरूक प्रहरी कहां हैं?
टायर-ट्यूब की तरह हर मुद्दे पर घूमने वाले लोग आज इस मुद्दे पर खामोश क्यों हैं?
आखिर ऐसा क्या है कि इतना बड़ा काम शहर के बीचोंबीच हो और किसी को दिखाई ही न दे?
हम सब अपनी आंखों के सामने अगर ऐसे काम होते देखते रहें और फिर भी चुप रहें, तो कल सवाल सिर्फ प्रशासन से नहीं होगा—हमसे भी होगा।
आज सवाल पूछना जरूरी है।
कौन करवा रहा है?
किसके लिए करवा रहा है?
किसकी अनुमति से करवा रहा है?
और किसके हित में नदी की जमीन को भरा जा रहा है?
अगर सब कुछ नियमों के अनुसार है तो प्रशासन सामने आए और जनता को दस्तावेज दिखाए।
अगर नियमों के विरुद्ध है तो तत्काल काम रुकवाया जाए और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई हो।
क्योंकि नदी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती।
नदी का प्राकृतिक बहाव आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।
आज घग्गर का रास्ता संकरा होगा तो कल बरसात का पानी रास्ता खुद बनाएगा।
और उस दिन नुकसान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं होगा—पूरा शहर भुगतेगा।
कभी हम बाढ़ के पानी को दोष देते हैं, कभी प्रशासन को, कभी मौसम को।
लेकिन अगर हम आज ही नदी के प्राकृतिक रास्ते को रोकने लगेंगे, तो कल प्रकृति अपना रास्ता खुद बनाएगी।
और एक सवाल उस हाईकोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी को लेकर भी है—क्या उसका उद्देश्य सिर्फ खानापूर्ति था?
क्या राज्य सरकार द्वारा नदी-नालों और जलस्रोतों को बचाने के आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
क्या राजस्थान के आदेश हनुमानगढ़ आते-आते बदल जाते हैं?
यह मामला किसी पार्टी का नहीं है।
यह मामला किसी व्यक्ति का नहीं है।
यह मामला हनुमानगढ़ के भविष्य, पानी और सार्वजनिक संपत्ति का है।
इसलिए आइए, आरोप लगाने से पहले दस्तावेज मांगें।
रिकॉर्ड सामने आए।
नदी की सीमा सार्वजनिक हो।
मिट्टी भर्ती की अनुमति सार्वजनिक हो।
जिम्मेदार विभाग और अधिकारी सामने आएं।
और अगर सब कुछ नियमों के अनुसार है तो जनता को संतुष्ट किया जाए।
लेकिन अगर नियमों की आड़ में नदी की जमीन का खेल हो रहा है, तो इसे किसी भी कीमत पर चुपचाप नहीं होने दिया जाना चाहिए।
आज सवाल घग्गर से है।
कल सवाल हमारे जोहड़ों से होगा।
परसों नालों से होगा।
और फिर शायद हमारे पास बचाने के लिए कुछ भी नहीं होगा।
घग्गर नदी को बचाना है तो सवाल पूछने होंगे।
खामोशी तोड़नी होगी।
रिकॉर्ड मांगना होगा।
और जिम्मेदारी तय करनी होगी।
📢 हनुमानगढ़ बोले—घग्गर की जमीन पर मिट्टी भर्ती किसके आदेश से?
आओ चर्चा करें…
सवाल पूछें…
जवाब मांगें…
Vijay Singh Beniwal ✍️
संगरिया की आवाज़
District Collector & Magistrate - Hanumangarh
DIPR, Department of Information & Public Relations, Rajasthan
Hanumangarh Police
Dr Rampratap Amit Choudhary Pramod Delu Manish Makkasar Manish Dharnia Bhajanlal Sharma CMO Rajasthan
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