हकीकत से कोसों दूर हैं हेल्पलाइन नंबर के दावे,बिजली कंपनी के हेल्पलाइन नंबर जब अस्तित्व में नही तो बिल पर देने का क्या फायदा,कोई ऐसा नंबर दे जो तुरंत उठा लिया जाए,अक्सर जब गली या मोहल्ले की बिजली अचानक गुल हो जाती है, या कहीं तारों में फाल्ट जैसी कोई गंभीर अनहोनी हो जाती है, तो हमारी पहली उम्मीद बिजली कंपनी का हेल्पलाइन नंबर होता है। 'द बीकानेर न्यूज़' की इस खास ग्राउंड रिपोर्ट में आइए जानते हैं
जब भी कोई आपात स्थिति होती है, तो उपभोक्ता सबसे पहले बिजली के बिल पर छपे नंबरों पर संपर्क करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि मदद के लिए दिए गए ये नंबर अक्सर अस्तित्व में ही नहीं होते।
हमारी पड़ताल में हेल्पलाइन व्यवस्था की जो खामियां सामने आईं, वे हैरान करने वाली हैं:
बिल पर दर्ज नंबरों का सच: बिजली के बिल पर जो नंबर प्रमुखता से दिए जाते हैं, उन पर फोन मिलाने पर अक्सर यही सुनने को मिलता है कि "यह नंबर अमान्य है" या "अस्तित्व में नहीं है।" आपातकाल में यह जवाब किसी भी उपभोक्ता को निराश करने के लिए काफी है।
व्हाट्सएप सहायता के नाम पर छलावा: जब उपभोक्ता कॉल से निराश होकर व्हाट्सएप का रुख करता है, तो वहां भी ऑटोमेटेड मैसेज के जंजाल में फंसकर रह जाता है। त्वरित समाधान के बजाय, यह प्रक्रिया इतनी उबाऊ और धीमी है कि आम आदमी परेशान होकर हार मान लेता है।
लैंडलाइन की सुस्त चाल: अगर कोई उपभोक्ता कड़ी मशक्कत के बाद लैंडलाइन पर शिकायत दर्ज करवा भी दे, तो वहां से प्रतिक्रिया आने में घंटों लग जाते हैं। शिकायत दर्ज होने के कम से कम 30से 40 मिनट बाद कंपनी की तरफ से फोन आता है।
सबसे बड़ा सवाल: जानमाल के खतरे का जिम्मेदार कौन?
कल्पना कीजिए, अगर गली में कहीं करंट दौड़ रहा हो, कोई तार टूट कर गिर गया हो, या कोई बड़ा हादसा होने की आशंका हो—ऐसे में क्या कोई व्यक्ति मदद के लिए एक घंटे तक इंतजार कर सकता है? इस एक घंटे की देरी में कोई बड़ी जनहानि हो सकती है। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर आम आदमी इस लापरवाही के बीच क्या करे और किसके भरोसे रहे?
आपकी राय है जरूरी
इस पूरी व्यवस्था पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? क्या आपने भी कभी इस तरह की परेशानी का सामना किया है?
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