#संगरिया का #अंडरपास: अदालत के आदेशों से निकला रास्ता, अब श्रेय लेने वालों की भी लगने वाली है कतार
संगरिया की आवाज़।
संगरिया शहर में वर्षों से जिस #अंडरब्रिज (#आरयूबी) का इंतजार किया जा रहा था, वह अब लगभग तैयार है। कुछ ही दिनों में यह मार्ग शहर और गुरु नानक बस्ती के बीच आवागमन का नया विकल्प बन जाएगा। इसे शहर का "इमरजेंसी डोर" भी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि रेलवे फाटक बंद होने की स्थिति में यह मार्ग हजारों लोगों को राहत प्रदान करेगा।
लेकिन इस उपलब्धि की सबसे दिलचस्प बात अंडरपास का निर्माण नहीं, बल्कि उसके श्रेय को लेकर शुरू हुई प्रतिस्पर्धा है। शहर में ऐसा माहौल बन गया है मानो यह #अंडरपास किसी एक नेता, किसी एक संगठन या किसी एक व्यक्ति के प्रयासों से बनकर तैयार हुआ हो।
सच्चाई यह है कि वर्षों तक यह परियोजना फाइलों, बैठकों, आश्वासनों और घोषणाओं के बीच उलझी रही। लोगों ने मांग उठाई, ज्ञापन दिए, धरने हुए, नेताओं ने मंचों से वादे किए, लेकिन जमीन पर काम की रफ्तार वैसी नहीं दिखी जैसी जनता अपेक्षा कर रही थी।
ऐसे समय में उपभोक्ता संरक्षण समिति संगरिया ने इस मुद्दे को केवल मांग तक सीमित नहीं रखा बल्कि कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना। बताया जाता है कि समिति के प्रतिनिधियों ने लगभग 115 बार अदालतों और विभिन्न कार्यालयों के चक्कर लगाए। लगातार पैरवी, दस्तावेजी संघर्ष और न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह मामला उस मुकाम तक पहुंचा जहां संबंधित विभागों को काम आगे बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
आज जब अंडरपास की दीवारों पर अंतिम रंग-रोगन चल रहा है और निर्माण कार्य लगभग पूरा होने की ओर है, तब शहर में एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। जो लोग वर्षों तक इस विषय पर मौन थे, वे भी अब सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कर रहे हैं। कुछ लोग ऐसे अंदाज में बधाई स्वीकार कर रहे हैं मानो खुद उन्होंने फावड़ा उठाकर खुदाई की हो।
राजनीति का अपना स्वभाव है। जहां जनता को सुविधा मिलती है, वहां श्रेय लेने वालों की संख्या स्वतः बढ़ जाती है। चुनावी मौसम हो या न हो, उपलब्धियों के साथ तस्वीर खिंचवाने का अवसर कोई नहीं छोड़ना चाहता। संगरिया भी इससे अलग नहीं है।
कई सज्जन अब यह साबित करने में लगे हैं कि यदि उन्होंने एक बार किसी बैठक में अंडरपास का उल्लेख किया था, तो निर्माण का वास्तविक श्रेय उन्हीं को मिलना चाहिए। कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें निर्माण कार्य लगभग पूरा होने के बाद अचानक याद आया कि उन्होंने भी कभी इस विषय पर चिंता व्यक्त की थी।
हालांकि जनता सब देखती है। लोगों को यह भी याद रहता है कि कठिन समय में कौन मैदान में था और कौन केवल मंचों पर भाषण दे रहा था। अदालतों के चक्कर लगाने वाले, दस्तावेज जुटाने वाले और वर्षों तक संघर्ष करने वाले लोगों का योगदान जनता की स्मृति में दर्ज रहता है।
इस अंडरपास का सबसे बड़ा महत्व केवल एक सड़क मार्ग होना नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि यदि कोई संगठन लगातार और व्यवस्थित तरीके से संघर्ष करे तो वर्षों से अटकी परियोजनाएं भी आगे बढ़ सकती हैं। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनहित याचिकाओं और न्यायिक हस्तक्षेप की शक्ति का भी उदाहरण है।
अब जब संगरिया को यह महत्वपूर्ण सुविधा मिलने जा रही है, तो आवश्यकता इस बात की है कि इसे राजनीतिक श्रेय की होड़ से ऊपर उठकर देखा जाए। यह पूरे शहर की उपलब्धि है। इसमें प्रशासन, न्यायपालिका, तकनीकी एजेंसियों और संघर्षरत नागरिकों का योगदान है।
फिर भी यदि श्रेय की होड़ जारी रहती है तो जनता मुस्कुराकर यही कहेगी—"जब गड्ढा खोदा जा रहा था तब कुछ लोग दिखाई नहीं दिए, लेकिन अब जब फीता कटने वाला है तो सबके हाथ में कैंची तैयार है।"
Vijay Singh Beniwal
संगरिया की आवाज़
Government of Rajasthan
Adv Ashish Nehra Jaskaran Singh Gill Premsukh Godara DhruvRaj Godara Jai Kaushik Sanjay Arya
Vinod Bishnoi हनुमानगढ़ रेल विकास संघ जिला रेल यात्री वेलफेयर एसोसिएशन, हनुमानगढ़