छत्तीसगढ़ के कोरबा से आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने हम सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है। खाना खाते वक्त मोबाइल पर रील देख रही एक महिला का जैसे ही इंटरनेट नेटवर्क गायब हुआ, उसने गुस्से में पहले फोन पटककर तोड़ दिया और फिर कथित तौर पर जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जान दे दी। यह महज एक पुलिस केस नहीं है, बल्कि उस खौफनाक दौर का आईना है जहाँ इंसानी धैर्य और मानसिक संतुलन, चंद सेकंड के वाई-फाई या मोबाइल सिग्नल का गुलाम बन चुका है।
यह त्रासदी सिर्फ एक परिवार का मातम नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी है। रील्स और सोशल मीडिया से मिलने वाले चंद पलों के 'डोपामाइन' ने हमारी सहनशीलता को इस कदर खोखला कर दिया है कि स्क्रीन का फ्रीज होना हमें जिंदगी खत्म करने तक के मोड़ पर ले आ रहा है। याद रखिए, मोबाइल हमारे जीवन की सिर्फ एक सुविधा है, हमारी सांसों का विकल्प नहीं। कभी स्क्रीन की दुनिया से बाहर निकलकर अपनों से भी बात कीजिए, क्योंकि इंटरनेट का नेटवर्क तो वापस आ सकता है, लेकिन यह जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी।
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