सरकारी विद्यालय की अंतिम बेंच पर बैठे जिलाधिकारी
आज के दौर में अक्सर यह धारणा बन गई है कि बड़े अधिकारी वातानुकूलित दफ्तरों और बंद कमरों तक ही सीमित रहते हैं। लेकिन मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी कुमार गौरव ने अपनी कार्यशैली से इस धारणा को बदलने की कोशिश की है। विद्यालय निरीक्षण के दौरान उन्होंने किसी विशेष कुर्सी पर बैठने के बजाय बच्चों के बीच जाकर कक्षा की अंतिम बेंच पर बैठना चुना। उनकी यह तस्वीर एक संवेदनशील, सरल और जमीन से जुड़े अधिकारी की कार्यशैली को बयां करती है।कुमार गौरव सर ने बच्चों के साथ बैठकर उनकी पढ़ाई, किताबों, शिक्षकों की पढ़ाने की शैली और विद्यालय की व्यवस्था के बारे में सीधे बातचीत की। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि बच्चे वास्तव में क्या सीख रहे हैं और उन्हें किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। यह निरीक्षण महज औपचारिकता नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को करीब से समझने का प्रयास नजर आया।जिम्मेदार और जवाबदेह अधिकारी वही है, जो सवालों को सुने, समस्याओं को समझे और जरूरत पड़ने पर त्वरित कार्रवाई के लिए खुद धरातल पर उतरे। अंतिम बेंच पर बैठा जिलाधिकारी इसी सोच का संदेश देता है कि प्रशासन केवल फाइलों और कार्यालयों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि जनता के बीच पहुंचकर वास्तविकता को समझना भी उसकी जिम्मेदारी है।एक सच्चा प्रशासक वह है जो फाइलों से निकलकर जमीन पर पहुंचे, लोगों की बात सुने और समस्याओं के समाधान की दिशा में तत्काल पहल करे। बच्चों के बीच बैठकर उनकी बात सुनना प्रशासन और समाज के बीच विश्वास की एक मजबूत तस्वीर पेश करता है। कुमार गौरव सर की यह सादगी और संवेदनशील कार्यशैली इस बात की मिसाल है कि अधिकारी जब अपनी कुर्सी से नीचे उतरकर आम लोगों के बीच बैठता है, तो प्रशासन की दूरी कम होती है और भरोसा बढ़ता है। अंतिम बेंच पर बैठा जिलाधिकारी सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि जवाबदेह और जनसरोकार वाले प्रशासन की सोच का प्रतीक बन जाता है।
@highlight District Administration Muzaffarpur
Arwal, Arwal | Sep 10, 2026