लाटूधाम वाण से कैलाश के लिए रवाना हुईं मां नंदा की देव डोलियां!! बेदनी कुंड में शुक्रवार आज होगा स्नान, पूजा-अर्चना और पितृ तर्पण, हजारों श्रद्धालु बनेंगे धार्मिक परंपरा के साक्षी!!
मां नंदा की कैलाश यात्रा के तहत गुरुवार को लाटूधाम वाण से मां नंदा की देव डोलियां और छंतोलियां कैलास के लिए रवाना हुईं। नंदा के धर्मभाई लाटू देवता की अगुवाई में देव डोलियों की विदाई के दौरान वाण गांव का माहौल भक्तिमय हो उठा। मां नंदा को कैलास के लिए विदा करते समय श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। नंदा के जयकारों के बीच देव डोलियां और उनके साथ श्रद्धालुओं का हुजूम निर्जन पड़ाव गैरोलीपातल के लिए रवाना हुआ।
नंदा की बड़ी जात के तहत दशोली और बंड की उत्सव डोलियां एवं छंतोलियां तथा बधाण की राजराजेश्वरी की लोकजात की उत्सव डोली भी कैलास यात्रा पर रवाना हुई। हजारों श्रद्धालु इस धार्मिक यात्रा में शामिल हुए और दुर्गम हिमालयी क्षेत्र की ओर बढ़े।
शुक्रवार को देव डोलियां बेदनी कुंड पहुंचेंगी, जहां मां नंदा और देवी-देवताओं का स्नान, पूजा-अर्चना तथा पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण की परंपरा का निर्वहन किया जाएगा। इस दौरान बेदनी कुंड में आस्था, लोकविश्वास और हिमालयी प्रकृति का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। धार्मिक परंपराओं के साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के बेदनी पहुंचने की उम्मीद है।
मान्यता है कि कैलास जाते समय मां नंदा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध कर उसे बेदनी कुंड में समाहित किया था। इसी मान्यता के कारण बेदनी कुंड नंदा भक्तों के लिए महज जलकुंड नहीं, बल्कि मां नंदा की सदियों पुरानी यात्रा और शक्ति-परंपरा का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
पुजारी देवीदत्त कुनियाल के अनुसार बेदनी कुंड में पितृ तर्पण की परंपरा के माध्यम से श्रद्धालु अपने पुरखों का स्मरण करते हैं। स्नान, पूजा-अर्चना और तर्पण के बाद बधाण की नंदा की लोकजात यात्रा शुक्रवार को वापस बांक गांव लौटेगी। इसके बाद नंदा की देव डोली छह माह के प्रवास के लिए सिद्धपीठ देवराड़ा के गर्भगृह में विराजमान होगी।
वहीं, नंदा की बड़ी जात के तहत दशोली और बंड की उत्सव डोलियां बेदनी कुंड से आगे उच्च हिमालय में स्थित होमकुंड के लिए रवाना होंगी। कठिन और चुनौतीपूर्ण हिमालयी मार्ग पार कर होमकुंड पहुंचने के बाद चैसिंग्या खाडुओं को कैलास के लिए विदा किया जाएगा। इसके बाद देव डोलियां सुतोल गांव लौटेंगी और सिद्धपीठ कुरूड़ पहुंचकर गर्भगृह में विराजमान होंगी।