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बालाघाट: उकवा बस्ती में निकला एक काला नाग वन विभाग उत्तर उकवा द्वारा रेस्क्यू कर छोड़ा गया सुरक्षित जंगल में #Specticle Cobra

Balaghat, Balaghat | Aug 11, 2021

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#बालाघाट 

डीएसआर (बोवार) पद्धति से धान की बुवाई को मिला बढ़ावा, 

किसान नेता महेश शरणागत ने किसानों से की डीएसआर पद्धति अपनाने की अपील

     बालाघाट जिले में धान की खेती में आधुनिक एवं जल संरक्षण आधारित तकनीकों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 26 जून को बालाघाट विकासखंड के ग्राम चीचगांव में जनपद सदस्य, एकता संघ जिला बालाघाट के अध्यक्ष एवं किसान मोर्चा जिला उपाध्यक्ष महेश शरणागत के कृषि खेत में डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) अर्थात बोवार पद्धति से सुपर सीडर मशीन द्वारा धान की बुवाई की गई।

       इस अवसर पर किसान नेता महेश शरणागत ने जिले के किसानों से अपील करते हुए कहा कि पहले अधिकांश किसान छिड़काव या बोवार पद्धति से धान की खेती करते थे। उस समय खेतों की मेड़ों में रुका पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बनाए रखता था, जिससे गांवों के कुओं और बोरवेल में पर्याप्त पानी उपलब्ध रहता था। साथ ही खेतों की मिट्टी भी भुरभुरी एवं उपजाऊ बनी रहती थी।

     उन्होंने कहा कि रोपा पद्धति के बढ़ते प्रचलन के कारण खेतों में अत्यधिक कीचड़ किया जाता है, जिससे मेड़ों का पानी जमीन में समाहित होने के बजाय सीधे नदी-नालों में बह जाता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है तथा खेतों की मिट्टी कठोर होती जा रही है। इसके कारण उतेरा एवं दलहनी फसलें जैसे उड़द, अलसी, पोपट एवं चना का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है।

     श्री शरणागत ने किसानों से डीएसआर (बोवार) पद्धति अपनाने का आग्रह करते हुए कहा कि इस तकनीक से खेती की लागत कम होती है, पानी की बचत होती है, मिट्टी की संरचना बेहतर बनी रहती है तथा खरीफ के बाद रबी एवं उतेरा फसलों का बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। यह पद्धति किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

       इसी क्रम में ग्राम मगरदर्रा में भी किसानों के खेतों में सुपर सीडर मशीन के माध्यम से डीएसआर पद्धति से धान की बुवाई कराई गई। इस दौरान कृषक अशोक उइके, बस्तीराम उइके, रामन चौधरी, राजेश राहंगडाले, छमन बाई ऐड़े सहित अन्य किसानों ने भी इस तकनीक को अपनाते हुए अपने खेतों में धान की बुवाई की।

      कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि डीएसआर तकनीक जल संरक्षण, कम लागत, श्रम की बचत तथा टिकाऊ कृषि की दिशा में एक प्रभावी विकल्प है। जिले में इस तकनीक के प्रति किसानों का बढ़ता रुझान भविष्य में कृषि को अधिक लाभकारी एवं पर्यावरण अनुकूल बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

#CMMadhyaPradesh 
#JansamparkMP 
#minmpkrishi

#बालाघाट डीएसआर (बोवार) पद्धति से धान की बुवाई को मिला बढ़ावा, किसान नेता महेश शरणागत ने किसानों से की डीएसआर पद्धति अपनाने की अपील बालाघाट जिले में धान की खेती में आधुनिक एवं जल संरक्षण आधारित तकनीकों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 26 जून को बालाघाट विकासखंड के ग्राम चीचगांव में जनपद सदस्य, एकता संघ जिला बालाघाट के अध्यक्ष एवं किसान मोर्चा जिला उपाध्यक्ष महेश शरणागत के कृषि खेत में डीएसआर (डायरेक्ट सीडेड राइस) अर्थात बोवार पद्धति से सुपर सीडर मशीन द्वारा धान की बुवाई की गई। इस अवसर पर किसान नेता महेश शरणागत ने जिले के किसानों से अपील करते हुए कहा कि पहले अधिकांश किसान छिड़काव या बोवार पद्धति से धान की खेती करते थे। उस समय खेतों की मेड़ों में रुका पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बनाए रखता था, जिससे गांवों के कुओं और बोरवेल में पर्याप्त पानी उपलब्ध रहता था। साथ ही खेतों की मिट्टी भी भुरभुरी एवं उपजाऊ बनी रहती थी। उन्होंने कहा कि रोपा पद्धति के बढ़ते प्रचलन के कारण खेतों में अत्यधिक कीचड़ किया जाता है, जिससे मेड़ों का पानी जमीन में समाहित होने के बजाय सीधे नदी-नालों में बह जाता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है तथा खेतों की मिट्टी कठोर होती जा रही है। इसके कारण उतेरा एवं दलहनी फसलें जैसे उड़द, अलसी, पोपट एवं चना का उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। श्री शरणागत ने किसानों से डीएसआर (बोवार) पद्धति अपनाने का आग्रह करते हुए कहा कि इस तकनीक से खेती की लागत कम होती है, पानी की बचत होती है, मिट्टी की संरचना बेहतर बनी रहती है तथा खरीफ के बाद रबी एवं उतेरा फसलों का बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। यह पद्धति किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी क्रम में ग्राम मगरदर्रा में भी किसानों के खेतों में सुपर सीडर मशीन के माध्यम से डीएसआर पद्धति से धान की बुवाई कराई गई। इस दौरान कृषक अशोक उइके, बस्तीराम उइके, रामन चौधरी, राजेश राहंगडाले, छमन बाई ऐड़े सहित अन्य किसानों ने भी इस तकनीक को अपनाते हुए अपने खेतों में धान की बुवाई की। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि डीएसआर तकनीक जल संरक्षण, कम लागत, श्रम की बचत तथा टिकाऊ कृषि की दिशा में एक प्रभावी विकल्प है। जिले में इस तकनीक के प्रति किसानों का बढ़ता रुझान भविष्य में कृषि को अधिक लाभकारी एवं पर्यावरण अनुकूल बनाने में सहायक सिद्ध होगा। #CMMadhyaPradesh #JansamparkMP #minmpkrishi

Balaghat, Madhya Pradesh | Jun 27, 2026

#बालाघाट 
प्राकृतिक खेती की मिसाल बने बिंझलगांव के कृषक अनिल बुधाना, 

पांच वर्षों से किसानों को कर रहे प्रेरित

       प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में बालाघाट जिले के विकासखंड लांजी के ग्राम बिंझलगांव के प्रगतिशील कृषक अनिल बुधाना आज क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। पिछले पांच वर्षों से वे स्वयं प्राकृतिक खेती अपनाने के साथ-साथ आसपास के गांवों के किसानों को भी रासायनिक खेती से हटकर प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने के लिए निरंतर प्रेरित कर रहे हैं।

      अनिल बुधाना ने अपने घर पर ही वर्मी कम्पोस्ट यूनिट, जीवामृत यूनिट, घनजीवामृत यूनिट तथा जैविक कीटनाशक निर्माण इकाई स्थापित की है। इनसे तैयार होने वाले जैविक उत्पादों का उपयोग वे अपनी खेती में करते हैं, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ-साथ खेती की लागत भी कम हुई है। यही नहीं, वे अन्य किसानों को भी उचित मूल्य पर ये जैविक उत्पाद उपलब्ध कराते हैं, ताकि अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ सकें।

         प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार को उन्होंने एक अभियान का रूप दे दिया है। वे किसानों के घर जाकर वर्मी कम्पोस्ट यूनिट स्थापित करने में सहयोग करते हैं, केंचुओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराते हैं तथा खाद तैयार होने तक नियमित रूप से तकनीकी मार्गदर्शन भी देते हैं। उनके प्रयासों से अनेक किसान अब स्वयं जैविक खाद तैयार कर प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

     अनिल बुधाना समय-समय पर कृषि विभाग एवं आत्मा परियोजना के विकासखंड तकनीकी प्रबंधक अजय बिजेवार से तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। नवीन तकनीकों को सीखकर वे उन्हें किसानों तक सरल भाषा में पहुंचाते हैं, जिससे प्राकृतिक खेती को गांव-गांव तक विस्तार मिल रहा है।

       अनिल बुधाना का मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल खेती की पद्धति नहीं, बल्कि मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा का प्रभावी माध्यम है। उनका कहना है कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम कर किसान कम लागत में सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

       आज बिंझलगांव सहित पूरे लांजी विकासखंड में अनिल बुधाना की पहचान प्राकृतिक खेती के अग्रदूत के रूप में बन चुकी है। उनके समर्पण और निरंतर प्रयासों से अनेक किसान प्राकृतिक खेती अपनाकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उनकी पहल जिले में प्राकृतिक खेती के विस्तार के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है।
#CMMadhyaPradesh 
#JansamparkMP 
#minmpkrishi

#बालाघाट प्राकृतिक खेती की मिसाल बने बिंझलगांव के कृषक अनिल बुधाना, पांच वर्षों से किसानों को कर रहे प्रेरित प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में बालाघाट जिले के विकासखंड लांजी के ग्राम बिंझलगांव के प्रगतिशील कृषक अनिल बुधाना आज क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। पिछले पांच वर्षों से वे स्वयं प्राकृतिक खेती अपनाने के साथ-साथ आसपास के गांवों के किसानों को भी रासायनिक खेती से हटकर प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने के लिए निरंतर प्रेरित कर रहे हैं। अनिल बुधाना ने अपने घर पर ही वर्मी कम्पोस्ट यूनिट, जीवामृत यूनिट, घनजीवामृत यूनिट तथा जैविक कीटनाशक निर्माण इकाई स्थापित की है। इनसे तैयार होने वाले जैविक उत्पादों का उपयोग वे अपनी खेती में करते हैं, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ-साथ खेती की लागत भी कम हुई है। यही नहीं, वे अन्य किसानों को भी उचित मूल्य पर ये जैविक उत्पाद उपलब्ध कराते हैं, ताकि अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ सकें। प्राकृतिक खेती के प्रचार-प्रसार को उन्होंने एक अभियान का रूप दे दिया है। वे किसानों के घर जाकर वर्मी कम्पोस्ट यूनिट स्थापित करने में सहयोग करते हैं, केंचुओं की उपलब्धता सुनिश्चित कराते हैं तथा खाद तैयार होने तक नियमित रूप से तकनीकी मार्गदर्शन भी देते हैं। उनके प्रयासों से अनेक किसान अब स्वयं जैविक खाद तैयार कर प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। अनिल बुधाना समय-समय पर कृषि विभाग एवं आत्मा परियोजना के विकासखंड तकनीकी प्रबंधक अजय बिजेवार से तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। नवीन तकनीकों को सीखकर वे उन्हें किसानों तक सरल भाषा में पहुंचाते हैं, जिससे प्राकृतिक खेती को गांव-गांव तक विस्तार मिल रहा है। अनिल बुधाना का मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल खेती की पद्धति नहीं, बल्कि मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा का प्रभावी माध्यम है। उनका कहना है कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम कर किसान कम लागत में सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। आज बिंझलगांव सहित पूरे लांजी विकासखंड में अनिल बुधाना की पहचान प्राकृतिक खेती के अग्रदूत के रूप में बन चुकी है। उनके समर्पण और निरंतर प्रयासों से अनेक किसान प्राकृतिक खेती अपनाकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उनकी पहल जिले में प्राकृतिक खेती के विस्तार के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है। #CMMadhyaPradesh #JansamparkMP #minmpkrishi

Balaghat, Madhya Pradesh | Jun 27, 2026

Bihar के Muzaffarpur में मुहर्रम के जुलूस में तलवार चलाते हुए Police के जवान का Video हुआ Viral!

Bihar के Muzaffarpur में मुहर्रम के जुलूस में तलवार चलाते हुए Police के जवान का Video हुआ Viral!

Balaghat, Balaghat | Jun 27, 2026

बालाघाट: उकवा बस्ती में निकला एक काला नाग वन विभाग उत्तर उकवा द्वारा रेस्क्यू कर छोड़ा गया सुरक्षित जंगल में #Specticle Cobra - Balaghat News