ये तेवर, ये घमंड, ये पावर… बस कुछ दिन का
अमरपाटन में एक छोटे दुकानदार की शिकायत ने सत्ता, प्रभाव और गरीब की रोजी-रोटी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
किसी गरीब परिवार के लिए दुकान महज चार दीवारें नहीं होती, बल्कि वही उसके बच्चों की पढ़ाई, घर के चूल्हे और पूरे परिवार के भविष्य का सहारा होती है। ऐसे में यदि किसी दुकान को गिराने या उस पर कब्जा करने की कोशिश का आरोप सामने आए, तो मामला सिर्फ जमीन का नहीं रह जाता, बल्कि सवाल इंसान की रोटी और सम्मान का भी बन जाता है।
अमरपाटन नगर परिषद क्षेत्र में सामने आए इस मामले में शिकायतकर्ता ने प्रशासन को आवेदन देकर आरोप लगाया है कि रामदयाल मार्केट के पास स्थित उसकी दुकान को गिराकर कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा है। शिकायतकर्ता के मुताबिक दुकान से संबंधित नगर परिषद के दस्तावेज, बिजली कनेक्शन, बिजली बिल और संपत्ति कर की रसीदें उसके पास हैं। आवेदन के साथ इन दस्तावेजों की प्रतियां भी लगाए जाने की बात कही गई है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि तेज हवा और बारिश से दुकान क्षतिग्रस्त हुई थी। वह जब अपनी दुकान की मरम्मत कराना चाहता था, तब कथित तौर पर विवाद खड़ा कर दिया गया। आरोप यह भी है कि दुकान को रात में गिराकर वहां कब्जा करने की कोशिश की जा सकती है।
सोचिए… जिस दुकान से एक परिवार अपने बच्चों का भरण-पोषण करता हो, अगर वही दुकान छिनने का डर उसके सामने खड़ा हो जाए तो उस परिवार पर क्या गुजरती होगी?
यही वह जगह है जहां व्यवस्था की असली परीक्षा होती है।
अगर शिकायतकर्ता के पास वास्तव में वर्षों से जमा किए गए नगर परिषद के कर की रसीद, बिजली का बिल और अन्य दस्तावेज मौजूद हैं, तो उसकी शिकायत को महज एक विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन को रिकॉर्ड की जांच करनी चाहिए और तब तक किसी भी पक्ष को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
और अगर शिकायतकर्ता के आरोप गलत हैं, तो जांच के बाद यह भी साफ हो जाना चाहिए। लेकिन जांच से पहले किसी कमजोर व्यक्ति की रोजी-रोटी उजाड़ देना न्याय नहीं हो सकता।
दीनदयाल के अंत्योदय की कसौटी पर सवाल
भारतीय जनसंघ के विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के विचार में समाज के अंतिम व्यक्ति तक सहायता और अवसर पहुंचाने की बात कही गई। ऐसे में भाजपा से जुड़े किसी भी सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति पर जब किसी गरीब की रोजी-रोटी उजाड़ने जैसे आरोप लगते हैं, तो यह प्रशासन और संगठन—दोनों के लिए गंभीर सवाल बन जाता है।
क्योंकि गरीब के पास अक्सर ताकत नहीं होती, पहुंच नहीं होती, प्रभाव नहीं होता। उसके पास अगर कुछ होता है तो वह होता है—उसकी मेहनत, उसकी छोटी-सी दुकान और उसके दस्तावेज।
तेवर और पावर हमेशा नहीं रहते
आज किसी के पास सत्ता है, प्रभाव है, पहुंच है और ताकत है। लेकिन वक्त कभी एक जगह नहीं रुकता।
ये तेवर, ये घमंड, ये पावर… बस कुछ दिन का है।
फिर तू क्या, फिर मैं क्या।
जिस चार फिट जमीन के लिए आज इतना संघर्ष है, आखिर एक दिन उसी मिट्टी में सबको मिल जाना है। फिर यह घमंड किस बात का? पावर किस बात की?