जंगल बचाने की जिद ने बदली गांव की तस्वीर, बैगा महिला उजियारो बाई बनीं जल-जंगल संरक्षण की मिसाल
दो दशक पहले पेड़ों की कटाई के खिलाफ शुरू की मुहिम, आज देश-विदेश में साझा कर रहीं संरक्षण का अनुभव
डिंडौरी जिले के समनापुर विकासखंड के पोंडी गांव की बैगा जनजाति की महिला उजियारो बाई ने जंगल और जल संरक्षण के क्षेत्र में सामुदायिक भागीदारी की अनूठी मिसाल पेश की है। करीब दो दशक पहले जब गांव के आसपास पेड़ों की लगातार कटाई हो रही थी, तब उन्होंने ग्रामीणों को जागरूक करने की मुहिम शुरू की।
उजियारो बाई का संदेश था—जंगल रहेगा, तभी पानी बचेगा। इसी सोच के साथ उन्होंने ग्रामीणों को साथ लेकर जंगल की निगरानी की व्यवस्था तैयार की। पेड़ों की कटाई रोकने के लिए समुदाय स्तर पर नियम बनाए गए और ग्रामीणों ने जंगल की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथों में ली।
जंगल बचा तो जलस्रोतों में आया सुधार
ग्रामीणों के अनुसार जंगल संरक्षण का असर धीरे-धीरे जलस्रोतों पर भी दिखाई देने लगा। जलस्तर में सुधार हुआ और पेयजल संकट कम हुआ। पानी की उपलब्धता बढ़ने से खेती के साथ-साथ सब्जी उत्पादन को भी बढ़ावा मिला।
इस तरह उजियारो बाई की पहल केवल जंगल बचाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर पानी, खेती और ग्रामीण आजीविका पर भी देखने को मिला।
तीसरी कक्षा तक पढ़ीं, फिर भी बनीं देश-दुनिया की आवाज
उजियारो बाई ने भले ही केवल तीसरी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की हो, लेकिन जंगल और जल संरक्षण के उनके अनुभव ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। वह दक्षिण अफ्रीका और फिनलैंड में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
वर्ष 2024 में भारत जल सप्ताह के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सामने भी अपने अनुभव साझा किए और बताया कि सामुदायिक प्रयासों से जंगल और जलस्रोतों को किस तरह संरक्षित किया जा सकता है।
उजियारो बाई की कहानी बनी प्रेरणा
आज उजियारो बाई उन ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने गांव और पर्यावरण के लिए बदलाव ला सकती हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि प्रकृति का संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
जंगलों को बचाने से लेकर जलस्रोतों के संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने तक उजियारो बाई की पहल ने साबित किया है कि स्थानीय समुदाय यदि एकजुट होकर काम करे तो बड़े बदलाव की नींव रखी जा सकती है।
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