बालाघाट के बैगा जनजाति के बच्चों की लगातार हो रही मौतें बेहद चिंताजनक और दुखद हैं।
बैगा जनजाति भारत की PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group) में शामिल है। इनके संरक्षण और विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अनेक योजनाएँ और विशेष बजट उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन सवाल यह है—क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तव में बैगा परिवारों तक पहुँच रहा है?
आज भी कई बैगा बस्तियों में:
* स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है; नल-जल योजना के बावजूद लोग नाले या नदी का पानी पीने को मजबूर हैं।
* स्वास्थ्य सुविधाएँ बेहद दूर हैं और अस्पताल तक पहुँचने में कई परिवारों को 40–50 किलोमीटर तक जाना पड़ता है।
* मलेरिया और अन्य बीमारियों का खतरा बना हुआ है।
* आंगनवाड़ी सेवाएँ सुचारू रूप से नहीं पहुँच पा रही हैं।
* बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्कूल की सुविधा नहीं मिल रही।
* परिवार बेहद सीमित संसाधनों में जीवन जी रहे हैं और छोटे खेतों से अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करते हैं।
ऐसे में अगर कुपोषण, दूषित पानी, मलेरिया और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी वजहों से बच्चों की जान जा रही है, तो यह केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है—यह हमारी व्यवस्था के सामने एक गंभीर सवाल है।
PVTG समुदायों के लिए विशेष योजनाएँ और बजट होने के बावजूद यदि सबसे कमजोर परिवारों और बच्चों तक बुनियादी सुविधाएँ नहीं पहुँच पा रही हैं, तो योजनाओं के क्रियान्वयन और जमीनी निगरानी पर गंभीरता से सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब समय है कि सरकार केवल कागजों पर योजनाएँ बनाने के बजाय बैगा समुदाय के बीच जाकर उनकी बात सुने, हर बस्ती की वास्तविक स्थिति का सर्वे करे और स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छ पानी, शिक्षा तथा सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं को तत्काल सुनिश्चित करे।
एक भी बच्चे की मौत को सामान्य नहीं माना जा सकता।
बैगा बच्चों का जीवन और उनका भविष्य हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
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