बाँदा का ऐतिहासिक मोहर्रम : 9वीं तारीख़ पर बाबू बख्श और रामा के इमामबाड़ों में खेला गया अलाव, रात भर चलता रहा पारंपरिक ढालों का मिलाप
बाँदा शहर में मोहर्रम की दस दिवसीय धार्मिक एवं पारंपरिक श्रृंखला के अंतर्गत 9वीं मोहर्रम पर सदियों पुरानी परंपराओं का भव्य और भावपूर्ण आयोजन हुआ। बाबू बख्श के इमामबाड़े और रामा के इमामबाड़े में अकीदतमंदों ने पूरी श्रद्धा के साथ अलाव खेलकर शहीदाने कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश की।
9वीं मोहर्रम की रात बाँदा में ढालों के मिलाप की ऐतिहासिक परंपरा का विशेष महत्व होता है। लगभग सभी इमामबाड़ों में आसपास के मोहल्लों और क्षेत्रों से निकली ढालें पहुँचती हैं, जहाँ उनका पारंपरिक मिलाप कराया जाता है। यह सिलसिला पूरी रात चलता रहता है और अज़ादार एक इमामबाड़े से दूसरे इमामबाड़े तक पहुँचकर इस ऐतिहासिक रस्म में शामिल होते हैं।
विशेष रूप से रामा के इमामबाड़े में विभिन्न मोहल्लों और इमामबाड़ों से निकली पारंपरिक ढालों का भव्य मिलाप होता है, जिसे देखने के लिए हजारों लोग पूरी रात मौजूद रहते हैं। यह दृश्य बाँदा की मोहर्रम परंपरा की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक पहचान माना जाता है।
इसके साथ ही बाबू बख्श के इमामबाड़े और रामा के इमामबाड़े में अलाव की रस्म अदा की गई। नौहाख्वानी, मातम और "या हुसैन (अ.स.)" की सदाओं से पूरा वातावरण गम, अकीदत और इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में सराबोर रहा।
बाँदा का मोहर्रम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब, आपसी भाईचारे, सामाजिक सौहार्द और साझा संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यहाँ सभी समुदायों के लोग बढ़-चढ़कर इन परंपराओं में सहभागी बनते हैं, जो शहर की ऐतिहासिक विरासत को और भी मजबूत बनाती हैं।
इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी हमें सत्य, न्याय, इंसानियत और अत्याचार के विरुद्ध डटकर खड़े होने का संदेश देती है। यही संदेश आज भी बाँदा की ऐतिहासिक मोहर्रम परंपराओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रहा है।
या हुसैन (अ.स.)
बाँदा की ऐतिहासिक मोहर्रम परंपरा हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।
UP 90 Creator
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Banda, Banda | Jun 26, 2026