बाँदा का ऐतिहासिक मोहर्रम : 9वीं तारीख पर बाबू बख्श और रामा के इमामबाड़ों में खेला गया अलाव, निकलीं पारंपरिक ढालें
बाँदा शहर में मोहर्रम की दस दिवसीय धार्मिक एवं पारंपरिक श्रृंखला के अंतर्गत बुधवार को 9वीं मोहर्रम पर बाबू बख्श के इमामबाड़े और रामा के इमामबाड़े में वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार अलाव खेला गया। इस दौरान शहर के विभिन्न मोहल्लों से पारंपरिक ढालें भी निकाली गईं, जिनमें बड़ी संख्या में अज़ादारों और श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
अलाव की रस्म देखने के लिए दोनों इमामबाड़ों पर बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ी। अज़ादारों ने पूरी अकीदत के साथ अलाव की परंपरा निभाई और इमाम हुसैन (अ.स.) तथा शहीदाने कर्बला को खिराज-ए-अकीदत पेश की। नौहाख्वानी, मातम और "या हुसैन" की सदाओं से पूरा वातावरण गम और श्रद्धा से सराबोर रहा।
बाँदा का मोहर्रम अपनी ऐतिहासिक और अनूठी परंपराओं के लिए पूरे बुंदेलखंड में विशेष पहचान रखता है। विशेष रूप से बाबू बख्श का इमामबाड़ा और रामा का इमामबाड़ा 9वीं मोहर्रम के अलाव की परंपरा के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ आयोजित धार्मिक रस्में गंगा-जमुनी तहज़ीब, आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द की मिसाल पेश करती हैं।
मोहर्रम के ये आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी, सत्य, न्याय, इंसानियत और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष के संदेश को भी जन-जन तक पहुँचाते हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी सभी समुदायों के लोगों की सहभागिता ने बाँदा की साझा संस्कृति को और मजबूत किया।
या हुसैन (अ.स.)
बाँदा की ऐतिहासिक मोहर्रम परंपरा हमारी सांस्कृतिक विरासत है, जिसे संजोकर रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
UP 90 Creator
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Banda, Banda | Jun 26, 2026