भगवान को हमारी भेंट नहीं, हमारी भावना चाहिए
जिसने हमें सब कुछ दिया हो, उसी की दी हुई चीजों में से थोड़ा-सा वापस करके यदि हम इस भ्रम में फूलें कि हमने भगवान पर कोई बहुत बड़ा उपकार कर दिया है, तो इससे अधिक बचकानी बात और क्या होगी?
जिस मिट्टी से हमारा शरीर बना, जिस हवा से हमारी सांसें चलती हैं, जिस पानी से हमारी प्यास बुझती है, जिस अन्न से हमारा पेट भरता है और जिस जीवन का एक-एक क्षण हमें मिला है—वह सब आखिर किसका दिया हुआ है? हम तो केवल उस अनंत कृपा के उपभोक्ता हैं, मालिक नहीं।
भगवान को महंगे फूल, बड़े-बड़े प्रसाद और दिखावे की पूजा से अधिक हमारे कर्मों की सुगंध प्रिय होती है। मंदिर में सिर झुकाना अच्छी बात है, लेकिन किसी दुखी इंसान के सामने अपना अहंकार झुका देना उससे कहीं बड़ी बात है। भगवान के चरणों में फूल चढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन किसी के जीवन में मुस्कान का फूल खिला देना उससे भी सुंदर पूजा है।
हम घंटों पूजा करते हैं, मंत्र पढ़ते हैं, व्रत रखते हैं और तीर्थों पर जाते हैं—लेकिन यदि हमारे व्यवहार से किसी का दिल दुखता है, हमारी वजह से किसी की आंखों में आंसू आते हैं और हमारे पास किसी जरूरतमंद की मदद करने का अवसर होने के बावजूद हम मुंह मोड़ लेते हैं, तो हमें अपनी भक्ति पर भी विचार करना चाहिए।
भगवान शायद यह नहीं पूछेंगे कि तुमने कितने मंदिरों में माथा टेका, बल्कि यह जरूर पूछ सकते हैं कि तुम्हारे कारण कितने लोगों ने अपना सिर उठाकर जीना सीखा।
अपना पेट भर लेना कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। यह तो प्रकृति ने हर जीव को सिखाया है। पशु-पक्षी भी अपने भोजन की व्यवस्था कर लेते हैं। इंसान होने का वास्तविक अर्थ तब सामने आता है, जब हम अपनी जरूरतों से आगे बढ़कर किसी दूसरे की जरूरत को समझते हैं।
कभी खुद थोड़ा कम खाकर किसी भूखे को भोजन करा देना,
कभी अपनी परेशानी भूलकर किसी परेशान व्यक्ति को हंसा देना,
कभी किसी निराश इंसान को उम्मीद दे देना,
कभी किसी गिरे हुए व्यक्ति को उठने का हौसला दे देना—
यही तो इंसानियत की असली पूजा है।
जिसके पास देने के लिए बहुत कुछ नहीं है, वह भी किसी को अपना समय दे सकता है, अच्छे शब्द दे सकता है, सम्मान दे सकता है और हौसला दे सकता है। कई बार किसी इंसान को धन की नहीं, केवल इस विश्वास की जरूरत होती है कि "कोई मेरे साथ खड़ा है।"
याद रखिए, भगवान को हमारी थाली का आकार नहीं, हमारे हृदय का आकार दिखाई देता है। मंदिर में चढ़ाया गया प्रसाद कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है, लेकिन किसी भूखे के पेट में पहुंचा भोजन उसकी दुआ बनकर लंबे समय तक हमारे साथ रहता है।
इसलिए पूजा जरूर कीजिए, मंदिर जरूर जाइए, भगवान का स्मरण जरूर कीजिए—लेकिन साथ ही किसी के चेहरे की मुस्कान का कारण भी बनिए।
क्योंकि भक्ति केवल हाथ जोड़ने का नाम नहीं, हाथ बढ़ाने का नाम भी है।
पूजा केवल दीप जलाने का नाम नहीं, किसी के अंधेरे जीवन में उम्मीद का दीप जलाने का नाम भी है।
और धर्म केवल भगवान को पाने का रास्ता नहीं, इंसान को इंसान समझने की सीख भी है।
अंततः जीवन का हिसाब धन-दौलत से नहीं, दुआओं से होता है।
यदि इस जीवन में हमारे कारण किसी भूखे को भोजन मिला, किसी रोते हुए चेहरे पर मुस्कान आई, किसी निराश व्यक्ति को उम्मीद मिली और किसी टूटे हुए इंसान ने फिर से जीने का साहस पाया—तो समझिए हमारी जिंदगी केवल बीती नहीं, सार्थक हुई है।
भगवान को देने के लिए हमारे पास अपना कुछ भी नहीं है, लेकिन भगवान की बनाई दुनिया में किसी के काम आने का अवसर हमारे पास जरूर है। शायद यही सबसे सुंदर भेंट है, जो हम उन्हें दे सकते हैं।