राजनीति की यह परिभाषा कि यहाँ कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता, किच्छा नगर पालिका चुनाव के मौजूदा घटनाक्रम में बिल्कुल सटीक बैठती है। टिकट वितरण के बाद जिस तरह से पार्टी के भीतर बागी सुर उठे और फिर डैमेज कंट्रोल के तहत दिग्गजों ने पर्चे वापस लेकर पार्टी प्रत्याशी (संदीप अरोड़ा) के पक्ष में एकजुटता दिखाई, उसने चुनावी तस्वीर में बड़े रोमांचक मोड़ ला दिए हैं।
चुनावी मौसम में बगावत के ठंडे पड़ने और समीकरणों के इस खेल पर आपकी क्या खास नजर है? क्या किच्छा का यह ऊँट किसी नए करवट बैठने के संकेत दे रहा है?