दिल्ली के सत्य निकेतन में दर्दनाक हादसा: मलबे में दबे छात्रों ने फिर पूछे व्यवस्था से सवाल
राजधानी में सपने लेकर आए छात्रों के लिए सुरक्षित छत भी क्यों नहीं?
दिल्ली के सत्य निकेतन में छात्रावास वाली इमारत के ढहने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। मलबे के बीच रेस्क्यूकर्मियों की यह तस्वीर उस दर्द को बयां कर रही है, जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है। हादसे में छात्रों की जान गई और कई लोग घायल हुए। राहत-बचाव अभियान के दौरान कई लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया।
ये बच्चे किसी अपराध के लिए नहीं, अपने भविष्य के सपने लेकर राजधानी आए थे। किसी के हाथ में किताबें होनी थीं, किसी की आंखों में नौकरी और परिवार को बेहतर जिंदगी देने का सपना। लेकिन सुरक्षित आवास और व्यवस्था की कमी के सवालों के बीच वही सपने मलबे में दब गए।
राजधानी में बड़े-बड़े कार्यालय, भव्य आयोजन और विकास के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या देश की राजधानी में पढ़ने आए छात्रों को सुरक्षित हॉस्टल और सम्मानजनक रहने की सुविधा देना भी सरकार की प्राथमिकता है?
अगर करोड़ों रुपये के आयोजनों और प्रचार पर खर्च करने की क्षमता है, तो छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती हॉस्टल क्यों नहीं?
यह सवाल सिर्फ भाजपा या किसी एक सरकार से नहीं, पूरी व्यवस्था से है। हादसे के कारणों की जांच और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। रिपोर्टों के मुताबिक भवन की स्थिति, निर्माण/बेसमेंट कार्य और सुरक्षा निगरानी को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं; अधिकारियों पर भी कार्रवाई की खबर है।
मलबे से निकलता हर छात्र सिर्फ मदद नहीं मांग रहा था—वह व्यवस्था से पूछ रहा था:
“हम सपने लेकर आए थे, क्या हमारी जिंदगी की कीमत इतनी कम है?”
— सुरेंद्र ठाकुर | PANGI LIVE NEWS
Chamba, Chamba | Sep 8, 2026