बिहार की मिट्टी ने न जाने कितनी ही ऐसी गाथाएं सीखी और देखी हैं, जहां गरीबी और उम्र के थपेड़ों के आगे रिश्ते और मजबूत हो जाते हैं।
एक ढलती हुई शाम को बिहार के एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर अजीब सा सन्नाटा था। स्टेशन पर न ओवरब्रिज की सुविधा थी, न ही कोई ढलान। केवल बिछी हुई लोहे की जंग लगी पटरियां थीं, जो एक पार से दूसरे पार तक फैली थीं।
पटरियों के एक तरफ खड़े थे 80 वर्ष के रामदेव जी, जिनकी अपनी कमर झुकी हुई थी, गालों पर झुर्रियों की गहरी लकीरें थीं और हाथ थोड़े कांप रहे थे। उनके साथ थे उनके बड़े भाई, 90 वर्ष के शिवपूजन जी। उम्र के इस पड़ाव पर शिवपूजन जी के पैर अब जवाब दे चुके थे, आंखें धुंधली हो चुकी थीं और उनसे दो कदम चलना भी दूभर था। उन्हें पटरियों के उस पार जाना था, जहां गांव की तरफ जाने वाला रास्ता था।
स्टेशन पर खड़े लोग देख रहे थे कि ये दोनों बूढ़े भाई क्या करेंगे। अचानक रामदेव जी ने अपने कमजोर हाथों से बड़े भाई के पैरों को छुआ, थोड़ा झुके और 90 साल के शिवपूजन जी को बड़ी हिफाजत से अपने कंधों पर उठा लिया—ठीक वैसे ही, जैसे बचपन में मेले में बड़ा भाई छोटे को अपने कंधों पर बिठाया करता था।
80 साल का छोटा भाई, अपने 90 साल के बड़े भाई का भार उठाए, रेलवे ट्रैक की गिट्टियों पर धीरे-धीरे कदम रखने लगा।
नंगे पैर, गिट्टियों की चुभन, और कंधे पर ढलता हुआ भारी वजूद... लेकिन रामदेव जी के चेहरे पर दर्द की जगह एक अजीब सा सुकून और गर्व था। हर एक कदम के साथ कांपते पैर संभल रहे थे। बड़ा भाई छोटे भाई के सिर पर हाथ रखे हुए था—मानो दुनिया का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच रामदेव जी के सिर पर हो।
वहां मौजूद लोगों की सांसें थम गईं। कोई चुपचाप यह नजारा देख रहा था, तो किसी की आंखें भर आई थीं। वो सिर्फ दो इंसान पटरी पार नहीं कर रहे थे, वो समाज को यह सिखा रहे थे कि जब भाई का साथ और आशीर्वाद सर पर हो, तो जिंदगी की कोई भी कठिन पटरी पार की जा सकती है।
रामदेव जी ने जब बड़े भाई को उस पार सकुशल उतारा, तो शिवपूजन जी की धुंधली आंखों से दो बूंद आंसू छलककर छोटे भाई के कंधे पर गिर गए। उस दिन उस छोटे से स्टेशन पर बिना कुछ कहे, दो भाइयों ने मोहब्बत और फर्ज की वो इबारत लिख दी, जो बिहार के संस्कारों की सबसे खूबसूरत तस्वीर बन गई। #bdbiharjharkhand
Gaya Town CD Block, Gaya | Aug 23, 2026