आवास योजना के दावों के बीच कच्चा घर बना मौत का मलबा!
छतरपुर में दो मासूमों की मौत के बाद सिस्टम से बड़ा सवाल—आखिर गरीबों के पक्के घर कब बनेंगे?
छतरपुर, मध्य प्रदेश।
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य था कि गरीब परिवारों को सिर पर पक्की छत मिले, ताकि बारिश, आंधी और प्राकृतिक आपदा में उनका परिवार सुरक्षित रह सके। लेकिन छतरपुर जिले से सामने आया दर्दनाक मामला इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
हिनौता थाना क्षेत्र की हथवा पंचायत के क्वटा गांव में लगातार बारिश के बीच एक गरीब मजदूर परिवार का कच्चा मकान रात करीब 3 बजे अचानक भरभराकर गिर गया। हादसे में मलबे में दबने से दो माह की मासूम शिवांशी और 15 वर्षीय रचना केवट की मौत हो गई, जबकि परिवार की महिला हेमकुमारी गंभीर रूप से घायल बताई जा रही हैं और उनका जिला अस्पताल में इलाज चल रहा है।
अब सवाल सिर्फ इस हादसे का नहीं है...
सवाल उस सिस्टम का है, जो गरीबों के लिए पक्के मकान की योजनाएं चलाने का दावा करता है।
बताया जा रहा है कि मृतक मासूम शिवांशी के पिता रामरतन केवट दिल्ली में मजदूरी करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि उन्हें रोजी-रोटी के लिए घर से दूर रहना पड़ता है।
जनसुनवाई में आवास की शिकायतें... फिर भी गरीबों की छत कच्ची क्यों?
छतरपुर कलेक्ट्रेट में हर मंगलवार होने वाली जनसुनवाई में आवास योजना को लेकर लगातार शिकायतें आने का दावा किया जाता है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पात्र गरीब परिवार योजना के लाभ से वंचित हैं, जबकि अपात्र लोगों को लाभ मिलने की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोग आरोप लगाते हैं कि आवास योजना का लाभ पात्रता के बजाय पहचान, पहुंच और प्रभाव के आधार पर मिल रहा है। कुछ शिकायतों में रिश्वत मांगने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए जाते हैं।
लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल है—
अगर ये शिकायतें लगातार जनसुनवाई में पहुंच रही हैं तो इनका निराकरण कितनी गंभीरता से होता है?
और अगर पात्र परिवार वास्तव में योजना से वंचित हैं, तो उनकी पात्रता की जांच कौन कर रहा है?
कागजों में पक्के मकान, जमीन पर कच्ची दीवारें?
सरकार की योजनाओं का असली मकसद तभी पूरा होगा, जब उसका लाभ उस परिवार तक पहुंचे जिसके घर की छत सच में खतरे में है।
क्वटा गांव की घटना के बाद प्रशासन से पूछा जाना जरूरी है—
क्या इस परिवार का प्रधानमंत्री आवास योजना में नाम था?
अगर नाम था तो आवास क्यों नहीं मिला?
अगर नाम नहीं था तो पात्रता की जांच किसने की?
क्या पंचायत स्तर पर परिवार का सर्वे हुआ था?
जनसुनवाई में आवास संबंधी शिकायतों पर कितने परिवारों को वास्तव में आवास मिला?
और क्या इस पूरे मामले की जिम्मेदारी तय होगी?
क्योंकि योजनाएं सिर्फ फाइलों और आंकड़ों में सफल होने से गरीब की जिंदगी सुरक्षित नहीं होती।
एक पक्का मकान शायद इन दो मासूमों की जिंदगी नहीं बचा पाता—ऐसा निश्चित तौर पर कहना संभव नहीं है। लेकिन यह सवाल जरूर है कि अगर परिवार को समय पर सुरक्षित आवास मिला होता, तो क्या इस तरह के हादसे का जोखिम कम किया जा सकता था?
अब जरूरत सिर्फ संवेदना जताने की नहीं, बल्कि जांच करने और जिम्मेदारी तय करने की है।
आवास योजना गरीब के लिए अधिकार और सुरक्षा की योजना है या फिर सिर्फ कागजों में दिखाई देने वाली सरकारी उपलब्धि?
छतरपुर प्रशासन को इस सवाल का जवाब देना चाहिए।