जनजातीय बहुल गांवों में कृषि से बदलेगी तस्वीर, वैज्ञानिकों ने किया तकनीकी सर्वे; उच्च मूल्य की फसलों पर दिया जोर
लखीसराय। जिले के जनजातीय बहुल क्षेत्रों में कृषि आधारित आजीविका को सुदृढ़ करने और किसान परिवारों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। जिला प्रशासन के अनुरोध पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की चार सदस्यीय वैज्ञानिकों की टीम ने गुरुवार को सूर्यगढ़ा प्रखंड के बरियारपुर पंचायत स्थित दुग्धम गांव का दौरा कर क्षेत्र का तकनीकी सर्वेक्षण एवं अध्ययन किया।
सर्वेक्षण का उद्देश्य अनुसूचित जनजाति समुदाय के किसानों को उच्च मूल्य वाली फल, औषधीय एवं सुगंधित फसलों की खेती से जोड़कर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है। टीम में क्षेत्रीय निदेशक डॉ. शिवनाथ दास, वरीय वैज्ञानिक डॉ. प्रभात कुमार, डॉ. एस.एस. सोलंकी तथा कृषि विज्ञान केंद्र हलसी के प्रधान वैज्ञानिक सुधीर कुमार शामिल थे।
निरीक्षण के दौरान ग्रामीणों ने सिंचाई के लिए नलकूप, सड़क निर्माण और नियमित बिजली आपूर्ति जैसी बुनियादी समस्याओं से वैज्ञानिकों को अवगत कराया। ग्रामीणों ने बताया कि वर्तमान में वे चिरोटा, तुलसी, हरजोर, रेंचा और मसूर की खेती के अलावा सूखी लकड़ी एवं तेंदूपत्ता बेचकर आजीविका चलाते हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया कि लगभग 30 एकड़ कृषि योग्य भूमि वर्षा और स्थानीय जलस्रोत ‘चुआ’ पर निर्भर है तथा खेती आज भी पारंपरिक हल-बैल से की जाती है। वहीं तेंदुआ, भालू, जंगली सूअर और बंदरों से फसलों को होने वाले नुकसान की समस्या भी सामने आई।
क्षेत्र की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों का आकलन करने के बाद वैज्ञानिकों ने किसानों को एप्पल बेर, आम, मिश्रीकंद, कटहल, बेल, कालमेघ, तुलसी और लेमनग्रास जैसी उच्च मूल्य एवं औषधीय फसलों की खेती अपनाने की सलाह दी। साथ ही अतिरिक्त आय के लिए बकरी पालन को बढ़ावा देने की भी अनुशंसा की।
इस दौरान जिला उद्यान पदाधिकारी राजीव रंजन, कृषि विज्ञान केंद्र हलसी के वैज्ञानिक डॉ. सुनील कुमार, प्रखंड विकास पदाधिकारी मंजुल मधुप, प्रखंड कृषि पदाधिकारी, प्रखंड उद्यान पदाधिकारी तथा प्रखंड कल्याण पदाधिकारी भी मौजूद रहे।
जिला प्रशासन का मानना है कि यह पहल जनजातीय क्षेत्रों में आधुनिक कृषि, आयवृद्धि और सतत आजीविका विकास की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।