#बालाघाट
समूह से मिली ताकत, छोटे कारोबार ने बदली जिंदगी
सुलेखा को स्व-सहायता समूह से मिली आर्थिक संबल की राह
अब कपड़ा व्यवसाय से कमा रहीं 15 से 20 हजार रुपये प्रतिमाह
जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हौसला, मेहनत और सही अवसर मिल जाए तो इंसान अपनी जिंदगी को नई दिशा दे सकता है। ग्राम साडरा निवासी सुलेखा शिन्दे की कहानी इसी संघर्ष, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की मिसाल है। पति स्वर्गीय प्रशांत शिन्दे के निधन के बाद सुलेखा अपने मायके लौट आईं। परिवार में उनकी माताजी, एक बेटा और वे स्वयं हैं। सीमित संसाधनों के बीच परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने आजीविका का रास्ता तलाशना शुरू किया और स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपने जीवन में बदलाव की शुरुआत की।
सुलेखा 27 जुलाई 2022 को वैष्णवी आजीविका स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। समूह में 15 सदस्य हैं। समूह की महिलाएं नियमित रूप से साप्ताहिक बैठक करती हैं और प्रत्येक सदस्य 25 रुपये साप्ताहिक बचत राशि जमा करती है। सुलेखा भी नियमित रूप से बैठकों में शामिल होती रहीं और समूह के निर्णयों में सहभागी बनीं।
50 हजार रुपये के ऋण से शुरू किया कपड़ा व्यवसाय
आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की इच्छा सुलेखा के मन में लगातार बनी हुई थी। उन्होंने समूह की बैठक में अपनी स्थिति बताते हुए छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए ऋण की आवश्यकता बताई। समूह का पहला सीसीएल 1.50 लाख रुपये का हुआ। इसमें से समूह की सदस्यों ने सुलेखा की जरूरत और व्यवसाय शुरू करने की इच्छा को देखते हुए उन्हें 50 हजार रुपये का ऋण उपलब्ध कराया। इस राशि से सुलेखा ने अपने घर से कपड़ों का व्यवसाय शुरू किया। शुरुआत में उनकी प्रतिदिन की शुद्ध आय करीब 300 रुपये तक रही। इससे घर का खर्च, बेटे की पढ़ाई और दुकान में सामान भरने की जरूरतें पूरी करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी।
दूसरी बार ऋण लेकर बढ़ाया कारोबार
समय के साथ सुलेखा के व्यवसाय में ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी। समूह का दूसरा सीसीएल 3 लाख रुपये का हुआ तो उन्होंने फिर बैठक में 50 हजार रुपये ऋण लेने के लिए आवेदन किया। इस राशि से उन्होंने आमगांव रोड पर किराये की दुकान ली, जिसका मासिक किराया एक हजार रुपये था। नई दुकान में उन्होंने अधिक मात्रा में कपड़े और रेडीमेड सामान रखा। व्यवसाय में उनकी अच्छी साख के कारण व्यापारियों ने भी उन्हें कुछ सामान उधार देना शुरू कर दिया। दुकान में विविध सामान उपलब्ध होने से ग्राहकों की संख्या बढ़ी और सुलेखा की आय में भी धीरे-धीरे वृद्धि होने लगी। उन्होंने समय पर अपना ऋण ब्याज सहित चुकाया। व्यवसाय में बढ़ती आमदनी ने उनमें आत्मविश्वास पैदा किया और उन्होंने अपने तथा परिवार के लिए स्वयं का घर बनाने का सपना भी देखा।
बैंक सखी की मदद से मिला मुद्रा लोन
व्यवसाय को और विस्तार देने के लिए सुलेखा ने आगे की योजना बनाई। उन्होंने सीआईएफ राशि के माध्यम से 50 हजार रुपये की सहायता ली। इसके साथ ही बैंक सखी अनुसूया बापुरे की मदद से मुद्रा लोन के लिए आवेदन किया। उनका मुद्रा लोन स्वीकृत हुआ और उन्हें 2 लाख रुपये की राशि प्राप्त हुई। सुलेखा ने इस राशि का उपयोग भी अपने कपड़ा व्यवसाय में किया। व्यवसाय में पूंजी बढ़ने के साथ उनका कारोबार आगे बढ़ा और आमदनी में भी वृद्धि हुई। आज सुलेखा की मासिक शुद्ध आय करीब 15 से 20 हजार रुपये तक पहुंच गई है। इसी आय से वे बैंक की किस्त और दुकान का किराया चुकाने के साथ परिवार की जरूरतें भी पूरी कर रही हैं।
अब अपने घर में रहती हैं सुलेखा
आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद सुलेखा ने अपने लिए छोटा सा घर भी बना लिया है। अब वे अपनी माताजी और बेटे के साथ अपने घर में रह रही हैं। जिस महिला के सामने कभी परिवार चलाने और बेटे की पढ़ाई की चिंता थी, आज वही महिला अपने व्यवसाय को संभालते हुए परिवार की जिम्मेदारियां स्वयं उठा रही है। सुलेखा की सफलता में स्व-सहायता समूह की भूमिका महत्वपूर्ण रही। समूह से मिली आर्थिक सहायता, सदस्यों का विश्वास, बैंकिंग सुविधाओं तक पहुंच और स्वयं की मेहनत ने उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया।
दूसरी महिलाओं के लिए संदेश
सुलेखा अन्य स्व-सहायता समूह की महिलाओं से कहती हैं कि समूह से उधार के रूप में मिली राशि का सदुपयोग करना चाहिए और ऋण की राशि समय पर चुकानी चाहिए। उनका कहना है कि यदि मेहनत और लगन के साथ मिले अवसर का सही उपयोग किया जाए तो परिस्थितियां बदलना संभव है।
सुलेखा की कहानी यह संदेश देती है कि स्व-सहायता समूह केवल बचत और ऋण का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने, अपना व्यवसाय शुरू करने और सम्मान के साथ आत्मनिर्भर जीवन जीने का महत्वपूर्ण जरिया भी बन सकते हैं।
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1 views | Balaghat, Madhya Pradesh | Sep 21, 2026