9 दिन से लापता बेटा... मां की आंखें दरवाजे पर, लेकिन कालपी पुलिस के हाथ अब भी खाली!
30 जून को घर से बाजार जाने की बात कहकर निकला युवक आज तक वापस नहीं लौटा।
2 जुलाई को परिजनों ने पुलिस को तहरीर दी, 5 जुलाई को गुमशुदगी दर्ज हुई, लेकिन 8 दिन बीत जाने के बाद भी युवक का कोई सुराग नहीं लग सका।
अब परिजनों का दर्द आक्रोश में बदलता नजर आ रहा है।
कालपी नगर के मोहल्ला उदनपुरा निवासी अली मोहम्मद (40 वर्ष) के लापता होने का मामला अब पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है।
परिजनों का आरोप है कि युवक का मोबाइल उसके पास था, लेकिन समय रहते तकनीकी माध्यमों से तलाश में पर्याप्त तेजी नहीं दिखाई गई।
उनका कहना है कि अगर शुरुआत में प्रभावी प्रयास किए जाते तो शायद कोई महत्वपूर्ण सुराग मिल सकता था।
कैमरे के सामने मां और बहन की आंखों में आंसू हैं।
मां की जुबान पर बस एक ही सवाल है—मेरा बेटा आखिर कहां है?
बहन कहती है कि हर फोन की घंटी पर उम्मीद जागती है, लेकिन हर बार मायूसी हाथ लगती है।
आखिर कब जागेगी जिम्मेदारी?
एक इंसान 8 दिन से लापता है। परिवार हर पल डर और बेचैनी में जी रहा है।
ऐसे मामलों में शुरुआती घंटे सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि खोजबीन की रफ्तार क्या रही और परिवार को अब तक क्या ठोस जानकारी मिली?
जनता पूछ रही है...
30 जून से लेकर आज तक युवक का कोई सुराग क्यों नहीं?
2 जुलाई को शिकायत मिलने के बाद खोज अभियान कितना तेज हुआ?
क्या हर गुमशुदगी को समान गंभीरता से लिया जाता है?
परिवार की चिंता और आशंकाओं का जवाब कौन देगा?
क्या समय पर तकनीकी जांच से मामले में प्रगति हो सकती थी?
आखिर कालपी क्षेत्र से जुड़े मामलों में बार-बार सवाल क्यों उठ रहे हैं?
अगर किसी के परिवार का सदस्य लापता हो जाए, तो क्या सिर्फ इंतजार ही विकल्प रह जाता है?
परिजनों ने पुलिस अधीक्षक जालौन से मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप कर युवक की जल्द बरामदगी और जांच में तेजी लाने की मांग की है।
मां का दर्द ----
मां की आंखों में ठहरा हुआ समंदर पूछ रहा है,
मेरा बेटा आखिर किस शहर में खो गया है।
जो वक्त पर कदम बढ़ा देते हैं, वो कई घर बचा लेते हैं,
देर से आई हर आहट, कई सवाल छोड़ जाती है।
इंसाफ की राह में देर न हो इतनी,
कि उम्मीद ही दम तोड़ दे।
एक मां की पुकार सुन लो,
कहीं इंतजार ही उसकी सबसे बड़ी सजा न बन जाए।
नोट: यह खबर परिजनों के आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तैयार की गई है।
मामले में पुलिस का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
आपकी क्या राय है?
क्या गुमशुदगी के मामलों में पुलिस को और अधिक तेजी और संवेदनशीलता से कार्रवाई करनी चाहिए?
क्या ऐसे मामलों में शुरुआती घंटों में तकनीकी जांच और खोज अभियान को और प्रभावी बनाया जाना चाहिए?
अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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Kalpi, Jalaun | Jul 11, 2026