सदियां बीत गईं, दौर बदल गया, लेकिन हिमाचल के ग्रामीण अंचलों में कई लोकपरंपराएं आज भी जीवित हैं। ऐसी ही एक रहस्यमयी लोकपरंपरा है डगैली पर्व। मान्यता है कि डगैली की रात अदृश्य शक्तियां नृत्य करती हैं, जिन्हें आम इंसान नहीं देख सकता।
इसी लोकमान्यता और प्राचीन परंपरा को शोध के जरिए समझने का प्रयास किया है चुडेश्वर कला मंच, जागल ने। मंच ने शोध के आधार पर डगैली के एक काल्पनिक नृत्य की प्रस्तुति भी तैयार की है।
देखिए ये खास रिपोर्ट।
हिमाचल की लोकसंस्कृति अपने भीतर कई अनसुनी और अनदेखी परंपराओं को समेटे हुए है। सिरमौर, शिमला और सोलन के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में डगैली पर्व मनाए जाने की मान्यता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसके नाम और रीति-रिवाज भी अलग हैं।
लोकविश्वास के अनुसार डगैली की रात डायन, भूत और पिशाच जैसी अदृश्य शक्तियों के विचरण और नृत्य से जुड़ी है। हालांकि इस परंपरा की शुरुआत कब और क्यों हुई, इसका कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक तथ्य सामने नहीं आता।
डगैली पर्व से पहले ग्रामीण परिवार अपने घर, पशुशाला और खेतों की सुरक्षा के लिए कई पारंपरिक उपाय करते हैं। अभिमंत्रित चावल और सरसों का छिड़काव, रक्षा सूत्र और विशेष वनस्पतियों की टहनियां लगाने जैसी परंपराएं आज भी कुछ क्षेत्रों में निभाई जाती हैं।
इसी प्राचीन लोकपरंपरा को दस्तावेज के रूप में संजोने के लिए चुडेश्वर कला मंच ने ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों से बातचीत कर जानकारी जुटाई। शोध के आधार पर डगैली गीत, पारंपरिक परिधान और अदृश्य नृत्य की काल्पनिक प्रस्तुति तैयार की गई है।
डगैली पर शोध, काल्पनिक नृत्य तैयार करने की प्रक्रिया और लोकसंस्कृति के संरक्षण पर।
चुडेश्वर कला मंच का कहना है कि इस प्रयास का उद्देश्य अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि हिमाचल की प्राचीन लोकपरंपराओं को समझना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है।
डगैली के पीछे आस्था है, लोकविश्वास है या सदियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृति—इसका प्रमाण भले ही स्पष्ट न हो, लेकिन हिमाचल की लोकविरासत में यह परंपरा आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।
न्यूज टुडे हिमाचल के लिए राजगढ़ से रवि दत्त भारद्वाज की रिपोर्ट।