भगवान ने हमें क्या दिया और हम क्या कर रहे हैं?
भगवान ने इस सृष्टि की रचना की। इंसान बनाए, जीव-जंतु बनाए, पेड़-पौधे और वनस्पतियां बनाईं। केवल सृष्टि की रचना ही नहीं की, बल्कि उसे जीवन देने के लिए स्वयं को पंचतत्वों में विभक्त कर दिया।
हमारी आस्था और सांस्कृतिक व्याख्या में ‘भगवान’ शब्द को पंचतत्वों से जोड़कर भी देखा जाता है—भ से भूमि, ग से गगन यानी आकाश, वा से वायु, अ से अग्नि और न से नीर अर्थात जल। ये वही पांच तत्व हैं जिनसे हमारा शरीर और यह संसार बना है।
जरा विचार कीजिए—भगवान ने हमसे क्या लिया? कुछ भी नहीं। बल्कि स्वयं को विभक्त करके हमें त्याग का अर्थ समझाया। धरती सबका भार उठाती है, आकाश सबको स्थान देता है, वायु बिना भेदभाव के सबको जीवन देती है, अग्नि ऊर्जा देती है और जल सबकी प्यास बुझाता है। प्रकृति का प्रत्येक तत्व हमें देने की शिक्षा देता है, लेने की नहीं।
इसके बाद भगवान ने मनुष्य को केवल जीवन ही नहीं दिया, बल्कि जीवन जीने की कला भी दी। परिवार दिया, ताकि मनुष्य अकेला न रहे; समाज दिया, ताकि वह मिल-जुलकर आगे बढ़े; और राष्ट्र दिया, ताकि उसमें एकता, जिम्मेदारी और कर्तव्य की भावना पैदा हो।
समय-समय पर भगवान के विभिन्न अवतारों और धार्मिक शिक्षाओं के माध्यम से मनुष्य को सत्य, नेकी, त्याग, करुणा, समानता, एकता और परोपकार का मार्ग दिखाया गया। संदेश यही था कि मनुष्य केवल अपने लिए न जिए, बल्कि उसके जीवन से दूसरों का भी कल्याण हो।
लेकिन आज हमें स्वयं से एक सवाल पूछने की आवश्यकता है—क्या हम भगवान की बताई राह पर चल रहे हैं?
हम मंदिरों में जाते हैं, पूजा करते हैं, धार्मिक आयोजन करते हैं, भगवान का नाम लेते हैं; लेकिन क्या हमारे व्यवहार में सत्य है? क्या हमारे भीतर दूसरों के लिए करुणा है? क्या हम जरूरतमंद के साथ खड़े होते हैं? क्या हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के बारे में सोचते हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने भगवान को याद करने का तरीका तो सीख लिया, लेकिन भगवान की शिक्षा पर चलना भूल गए?
आज इंसान धन, पद, प्रतिष्ठा और अहंकार के पीछे इतना भाग रहा है कि कई बार उसे लगता है कि वही सबसे बड़ा है। जबकि जिस मिट्टी पर वह खड़ा है, जिस हवा में सांस लेता है, जिस पानी को पीता है और जिस अग्नि से ऊर्जा पाता है—उस पर उसका कोई अधिकार नहीं, वह तो उसे प्रकृति की ओर से मिली अमूल्य देन है।
भगवान ने स्वयं को पंचतत्वों में बांटकर हमें बताया कि महानता अपने लिए सब कुछ जुटा लेने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए कुछ बन जाने में है।
इसलिए भगवान को केवल मंदिरों में खोजने के बजाय उनके बताए रास्ते पर चलना जरूरी है। किसी भूखे को भोजन देना, किसी दुखी के आंसू पोंछना, किसी जरूरतमंद का सहारा बनना, किसी के साथ अन्याय न करना, प्रकृति की रक्षा करना और समाज में प्रेम व भाईचारा बढ़ाना—शायद यही सच्ची भक्ति का सबसे सुंदर रूप है।
आखिर में हमें इतना ही समझना होगा कि भगवान ने हमें मनुष्य का जीवन इसलिए नहीं दिया कि हम दूसरों को छोटा समझें, बल्कि इसलिए दिया कि हम अपने कर्मों से मानवता को बड़ा बनाएं।
भगवान ने हमें जीवन दिया, प्रकृति दी, परिवार दिया, समाज दिया और सही-गलत पहचानने की बुद्धि दी। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके दिए जीवन का उपयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए करें या पूरी मानवता के कल्याण के लिए।
सच्ची पूजा शायद वही है, जिसमें माथा भगवान के सामने झुके और व्यवहार इंसान के काम आए। #viralreelsfacebook #viralreelsinstagram #kayasthaworld Ranjeet Bahadur Manoj Kumar Srivastav Harihar Kumar Srivastava Sharad Srivastava