🤔🤔पहाड़ में गुलदार के हमलों ने सात परिवारों के चिराग बुझा दिए। गांवों में भय का माहौल है, लोग शाम ढलते ही घरों में कैद होने को मजबूर हैं। लेकिन सत्ता और विपक्ष के बयान सुनकर ऐसा लगने लगा है कि दर्द भी अब राजनीतिक शब्दावली में बदल गया है।जब वन मंत्री से सवाल पूछा गया तो जवाब मिला कि हर परिवार के घर जाकर सांत्वना देना संभव नहीं है। बात अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन हैरानी तब हुई जब विपक्ष के बड़े चेहरे भी लगभग उसी विचार के साथ खड़े नजर आए। ऐसे में जनता यह सोचने पर मजबूर है कि आखिर मुद्दे पर लड़ाई है या फिर केवल मंचों तक सीमित राजनीति?ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें नेताओं की मौजूदगी से ज्यादा संवेदनशीलता की जरूरत है। दुख के समय कोई कंधे पर हाथ रख दे, यही बहुत होता है। लेकिन यहां तो बयान ऐसे आ रहे हैं मानो जनता को समझाया जा रहा हो कि दुख भी अपनी सीमाओं में रहकर ही मनाना चाहिए।पहाड़ की जनता अब यह भी पूछ रही है कि चुनाव के समय हर घर तक पहुंचने वाले नेता, संकट के समय रास्ता क्यों भूल जाते हैं? वोट मांगने के लिए पहाड़ की दुर्गम चढ़ाइयां आसान लगती हैं, लेकिन पीड़ित परिवारों तक पहुंचना असंभव कैसे हो जाता है?
2027 अभी दूर है, लेकिन जनता के मन में उठ रहे सवाल हर दिन और करीब आते जा रहे हैं। क्योंकि पहाड़ का आदमी भले ही कम बोलता हो, लेकिन वह यह जरूर याद रखता है कि उसके आंसुओं के समय कौन उसके साथ खड़ा था और कौन बयान देकर आगे बढ़ गया।आखिर जनता के दर्द पर राजनीति करने वाले नेता, जनता के दर्द के समय इतने असहाय क्यों दिखाई देते हैं?
Pauri, Garhwal | Jun 2, 2026