आखिर कब तक पत्रकार इस तरह की जिल्लत झेलता रहेगा?
पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। वह दिन-रात मेहनत करके समाज की समस्याओं को सामने लाता है, आम लोगों की आवाज बनता है और व्यवस्था से जुड़े सवालों को उठाता है। लेकिन जब वही पत्रकार अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए अपमान या दुर्व्यवहार का सामना करता है, तो यह केवल एक पत्रकार का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि पूरी पत्रकार बिरादरी के सम्मान का सवाल बन जाता है।
सहरसा की घटना के संदर्भ में भी जरूरी है कि पूरे मामले को निष्पक्षता और संयम के साथ देखा जाए। किसी पर आरोप लगाना हमारा उद्देश्य नहीं है, लेकिन पत्रकार के सम्मान और अधिकारों की रक्षा होना बेहद जरूरी है।
पत्रकार से सवालों पर असहमति हो सकती है, उसकी खबर पर आपत्ति हो सकती है, लेकिन उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए। पत्रकार भी समाज का ही हिस्सा है और वह अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए जनता के हित में काम करता है।
जरूरत इस बात की है कि पत्रकारों के सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर समाज और जिम्मेदार संस्थाएं गंभीरता से सोचें। पत्रकार कमजोर नहीं, लोकतंत्र की आवाज है—उसकी आवाज को सम्मान मिलना चाहिए।
Araria, Araria | Sep 13, 2026