शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बढ़ता बोझ : विद्यार्थियों की पढ़ाई राम भरोसे
हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ ने खोला मोर्चा, प्रदर्शन कर सौंपा ज्ञापन, आंदोलन की दी चेतावनी
दबाव की नीति से बीएलओ परेशान, 24 घंटे में दो बार मांगी जा रही रिपोर्ट : सुमेर आर्य
भिवानी, 22 जून : हरियाणा में शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों के अधिकारों को लेकर एक बार फिर टकराव की स्थिति बन गई है। प्रदेश में 15 जून से शुरू हुए गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्य को लेकर हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ (रजि.) ने कड़ा रोष प्रकट किया है। संघ का आरोप है कि इस कार्य के चलते जहां एक तरफ विद्यार्थियों की पढ़ाई पूरी तरह चौपट हो रही है, वहीं दूसरी तरफ फील्ड में तैनात शिक्षकों पर अधिकारियों द्वारा अमानवीय और अनावश्यक मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। इस संबंध में संघ की ओर से सोमवार को शहर में प्रदर्शन करते हुए चुनाव आयुक्त व प्रदेश सरकार के नाम मांगपत्र सौंपा। इस दौरान प्रदर्शन को सर्व कर्मचारी संघ के वरिष्ठ उपप्रधान सूरजभान जटासरा व जिला सचिव धर्मवीर सिंह भाटी, हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के जिला प्रधान अजीत राठी, जिला सचिव सुमेर आर्य, लाजपत जाखड़, खंड प्रधान संजय गौरीपुर, अजय कुमार, संजय कुमार, राजेश कुंगड़, महेंद्र सिंह, संजय सिंह, राजबीर सिंह, पवन कुमार आदि नेताओं ने संबोधित किया।
हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ संबद्ध सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा एवं स्कूल टीचर्ज फैडरेशन ऑफ इंडिया के पदाधिकारियों ने संयुक्त बयान में बताया कि गहन पुनरीक्षण कार्य में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की ड्यूटियां लगा दी गई है। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि अनेक विद्यालय लगभग पूरी तरह से खाली हो गए है। जब शिक्षक ही स्कूलों में नहीं होंगे, तो विद्यार्थियों की पढ़ाई का प्रभावित होना लाजमी है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ प्रधानाचार्यों, पीजीटी और टीजीटी शिक्षकों को सुपरवाइजर तथा कंट्रोल रूम में नोडल अधिकारी बनाकर उन्हें मुख्य शैक्षणिक कार्य से दूर किया जा रहा है। इन नोडल अधिकारियों को हजारों फार्मों की ऑनलाइन और ऑफलाइन जांच तथा मिलान करने के अव्यावहारिक लक्ष्य सौंपे जा रहे हैं ।
उन्होंने आरोप लगाया कि हालांकि एसआईआर के गणना प्रपत्रों को भरने के लिए पूरा एक महीना निर्धारित किया गया है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा तानाशाही रवैया अपनाते हुए अनावश्यक दबाव बनाया जा रहा है। अधिकारियों द्वारा बीएलओ पर अविश्वास जताते हुए चार-पांच दिनों के भीतर ही सभी गणना प्रपत्र वितरित करने का टारगेट दिया जा रहा है और दिन में दो-दो बार गूगल शीट के माध्यम से जबरन रिपोर्ट मांगी जा रही है।
इस मौके पर कर्मचारी नेताओं ने कहा कि अधिकांश मतदाता गणना प्रपत्र स्वयं भरने में सक्षम नहीं हैं, जिसके कारण त्रुटियों को ठीक करने और पूरा प्रपत्र भरने का सारा बोझ अकेले बीएलओ (शिक्षक) पर आ गया है। बिना किसी सहायक या तकनीकी कर्मचारी के यह कार्य अकेले करना बेहद कठिन और मानसिक रूप से प्रताडि़त करने वाला है। बीएलओ पर बनाए जा रहे इसी तरह के मानसिक दबाव के कारण पूर्व में अन्य राज्यों से आत्महत्या जैसी कई दुखद और अमानवीय घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
शिक्षक संघ ने सरकार और चुनाव आयोग को कानूनी प्रावधानों की याद दिलाते हुए कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 24 एवं 27 में यह स्पष्ट रूप से अंकित है कि शिक्षकों से किसी भी प्रकार का गैर-शैक्षणिक कार्य नहीं लिया जा सकता। अधिनियम के तहत प्राथमिक कक्षाओं के लिए न्यूनतम 200 दिन और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए 220 दिन का अनिवार्य अध्यापन सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में महीनों तक चलने वाले चुनावी व प्रशासनिक सर्वे कार्यों में शिक्षकों को झोंकना न सिर्फ आरटीई की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है।
रोष प्रदर्शन कर रहे जिला कार्यकारिणी के पदाधिकारियों ने दो-टूक शब्दों में सरकार के सामने अपनी मांगें रखी कि गहन पुनरीक्षण और बीएलओ जैसे कार्यों के लिए अलग से योग्य और शिक्षित बेरोजगार युवाओं की नियुक्ति की जाए, शिक्षकों को तुरंत प्रभाव से इन अतिरिक्त ड्यूटी से मुक्त कर वापस कक्षाओं में भेजा जाए। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि शिक्षकों पर बनाया जा रहा यह अनावश्यक और अनुचित प्रशासनिक दबाव तुरंत बंद नहीं किया गया, तो संगठन चुप नहीं बैठेगा।