प्रशासनिक दमन के बावजूद तीसरे दिन भी जारी रहा विस्थापितों का चिता आंदोलन
“बिजली-पानी काटकर अंग्रेजी राज की याद दिला रही सरकार” — अमित भटनागर
आदिवासी दलित क्रांति सेना (बुंदेलखंड), एवं कांग्रेस के बाद समाजवादी पार्टी ने भी दिया समर्थन
पन्ना। केन बेतवा, मझगाय बांध, रुँझ और अन्य परियोजनाओं से प्रभावित विस्थापितों के न्याय, उचित मुआवजे और पुनर्वास की मांग को लेकर चल रहा चिता आंदोलन आज तीसरे दिन भी जारी रहा। प्रशासनिक दबाव और कथित दमन के बावजूद आंदोलनकारी अपने गांव, घर, जमीन और अधिकारों की लड़ाई से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
आंदोलन को अब राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। कांग्रेस के बाद समाजवादी पार्टी ने भी विस्थापितों के चिता आंदोलन को समर्थन दिया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि लगातार बढ़ते जलस्तर और डूबते घरों के बीच प्रशासन को समस्या का समाधान करना चाहिए, लेकिन इसके विपरीत आंदोलन को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
जय किसान संगठन के नेतृत्व में आंदोलन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा कि—
“सरकार समस्याओं का समाधान करने के बजाय आंदोलनकारियों की बिजली और पानी काट रही है। अपने हक और अधिकार के लिए आंदोलन कर रहे आदिवासी-किसानों से बिजली छीनना, पानी रोकना और पुलिस के दबाव से पंचायत का टैंकर वापस करवाना लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक है। यह कार्रवाई हमें अंग्रेजी राज की याद दिलाती है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस द्वारा आंदोलनकारियों को धमकाकर पंचायत का पानी का टैंकर वापस पंचायत में रखवा दिया गया। उन्होंने कहा कि बिजली-पानी बंद करने से आंदोलन समाप्त नहीं होते। अंग्रेजों के दमन से भी इस देश के स्वतंत्रता सेनानी नहीं डरे थे और आज भी आदिवासी-किसान अपने अधिकारों की लड़ाई से डरने वाले नहीं हैं।
अमित भटनागर ने कहा कि प्रशासन को दमन का रास्ता छोड़कर आंदोलनकारियों से संवाद करना चाहिए।
“आज भी सरकार और कलेक्टर तक जमीनी सच्चाई पूरी तरह नहीं पहुंच पा रही है। परियोजना में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। यदि प्रशासन वास्तव में समाधान चाहता है तो आंदोलनकारियों के साथ बैठकर गांव-गांव की वास्तविक स्थिति समझे और शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराए।”
कानून और संविधान के पालन पर सवाल
अमित भटनागर ने कहा कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (LARR Act, 2013) में प्रभावित लोगों के अधिकारों और पुनर्वास से संबंधित स्पष्ट प्रावधान हैं।
उन्होंने कहा कि धारा 11 सामाजिक प्रभाव आकलन/प्रारंभिक अधिसूचना की प्रक्रिया में ग्राम सभा और संबंधित स्थानीय संस्थाओं की भूमिका से जुड़ी है। वहीं, भूमि पर कब्जे के संबंध में धारा 38 महत्वपूर्ण है, जिसके अनुसार निर्धारित मुआवजा और पुनर्वास संबंधी वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए बिना प्रभावित परिवारों को उनके अधिकारों से वंचित करने का प्रश्न गंभीर हो जाता है।
उन्होंने कहा—
“मुख्यमंत्री द्वारा घोषित ₹12.50 लाख की सहायता तक कई प्रभावित परिवारों को नहीं मिली है। कई परिवारों को तो ₹5 लाख भी नहीं मिले। अनेक लोगों को मकान, जमीन और परिसंपत्तियों का पूरा मुआवजा नहीं मिला और दूसरी ओर उनकी जमीनों को असिंचित बताकर मुआवजे में कमी की जा रही है। यह स्थिति केन-बेतवा लिंक परियोजना के साथ-साथ मझगाय और रुंझ जैसी परियोजनाओं में भी गंभीर सवाल खड़े करती है।”
उन्होंने मांग की कि प्रभावित परिवारों को पूरी परिसंपत्तियों का पारदर्शी मूल्यांकन, उचित मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और वैधानिक अधिकार सुनिश्चित किए जाएं।
“पैसे देने वालों का ज्यादा, गरीबों का कम” — जांच की मांग
आंदोलनकारियों ने परियोजना से जुड़े राजस्व और मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए हैं। उनका आरोप है कि कुछ अधिकारी-कर्मचारी और पटवारी कथित रूप से बिना पैसे लिए काम नहीं करते तथा रिश्वत देने वाले लोगों के रिकॉर्ड/मुआवजे में अधिक लाभ और गरीब प्रभावितों के मामलों में कम लाभ दिए जाने की शिकायतें हैं।
अमित भटनागर ने कहा कि इन आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि वास्तविकता सामने आ सके।
उन्होंने कहा कि यही सवाल सिंगरौली तथा ललितपुर रेल मार्ग जैसी परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के मामलों में भी उठ रहे हैं। विकास के नाम पर लोगों के घर-जमीन लिए जा सकते हैं, लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि कानून, संविधान और प्रभावित नागरिकों के अधिकारों को दरकिनार कर दिया जाए।
“विस्थापितों के सब्र का बांध टूट रहा है”
चिता आंदोलन के तीसरे दिन आंदोलनकारियों और प्रभावित परिवारों में चिंता और आक्रोश दोनों बढ़ता दिखाई दिया। कई परिवारों के सामने अपने घर और जीवनभर की संपत्ति के डूबने का खतरा है। उनकी आंखों में चिंता और आंसू हैं, लेकिन प्रशासन की ओर से समस्या के स्थायी समाधान के बजाय आंदोलन को दबाने की कोशिशों से स्थिति और गंभीर होती जा रही है।
अमित भटनागर ने चेतावनी देते हुए कहा—
“एक तरफ प्रशासन आंदोलन को दबाने पर उतारू है और दूसरी तरफ विस्थापितों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। डूबते घरों को देखकर भी यदि प्रशासन नहीं जागता और उल्टा आंदोलनकारियों की बिजली-पानी काटता है, तो यह सरकार और प्रशासन की असंवेदनशीलता को ही उजागर करता है।”
उन्होंने सरकार से अपील की कि दमन बंद कर तत्काल संवाद शुरू किया जाए, प्रभावित परिवारों की शिकायतों की स्वतंत्र जांच कराई जाए और कानून तथा संविधान के अनुसार मुआवजा एवं पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए।
आंदोलनकारियों का स्पष्ट संदेश है—
“जल–जंगल–जमीन–जीवन, संविधान और लोकतंत्र बचाने की यह लड़ाई दमन से नहीं रुकेगी।”
Shahnagar, Panna | Sep 14, 2026