रोडवेज डिपो में कथित मंथली का खेल? ऑनलाइन ट्रांजैक्शन से उठे बड़े सवाल
संविदा परिचालक ने डीएम को सौंपा शिकायती पत्र, पैसे मांगने, धमकी और मारपीट के लगाए आरोप; फोनपे लेनदेन व मेडिकल रिपोर्ट देने का दावा
सरकारी रोडवेज डिपो की कार्यप्रणाली को लेकर एक शिकायत ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
उरई डिपो में संविदा परिचालक के पद पर कार्यरत विकास कुमार ने 28 सितंबर को जिलाधिकारी को शिकायत देकर कथित रूप से नियमित पैसे की मांग, ऑनलाइन लेनदेन, नौकरी से हटाने की धमकी और मारपीट के आरोप लगाए हैं।
शिकायतकर्ता के मुताबिक वह वर्ष 2018 से संविदा परिचालक के रूप में कार्यरत है।
उसका आरोप है कि पहले उससे कथित रूप से पैसे लिए जाते थे, लेकिन पैसा देना बंद करने के बाद उस पर कार्रवाई का दबाव बनाया गया।
शिकायत में दावा किया गया है कि ड्राइवर और अन्य कर्मचारियों के माध्यम से अधिकारियों तक पैसा पहुंचाने के लिए ऑनलाइन लेनदेन कराया जाता था।
मामला तब और गंभीर हो गया जब शिकायतकर्ता ने कथित फोनपे ट्रांजैक्शन का विवरण जिलाधिकारी कार्यालय में प्रस्तुत करने और मेडिकल रिपोर्ट संलग्न करने की बात कही।
अब जांच का सबसे बड़ा बिंदु यही है कि जिन रकमों का विवरण शिकायत के साथ दिया गया है, वे आखिर किस खाते से किस खाते में गईं?
रकम किस तारीख को भेजी गई और उसका वास्तविक उद्देश्य क्या था?
23 सितंबर की घटना ने बढ़ाया विवाद
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि 23 सितंबर को झांसी से उरई लौटते समय पिरौना नहर के पास बस संख्या UP78 LN 3340 को रोका गया। शिकायत के अनुसार वहां पैसे को लेकर बातचीत हुई और बाद में नौकरी समाप्त करने की धमकी तथा मारपीट का आरोप लगाया गया।
वहीं दूसरी तरफ प्रकाशित रिपोर्टों में 23 सितंबर की बस चेकिंग के दौरान बिना टिकट यात्रियों को लेकर विवाद और परिचालक पर अधिकारियों के साथ मारपीट के आरोपों की बात सामने आई है। इस संबंध में थाने में रिपोर्ट दर्ज होने की भी बात कही गई है।
ऐसे में सवाल सिर्फ शिकायत के आरोपों का नहीं, बल्कि 23 सितंबर को मौके पर वास्तव में क्या हुआ था, इसका भी है।
डिजिटल रिकॉर्ड से खुल सकता है पूरा राज?
यदि शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए ऑनलाइन लेनदेन के दस्तावेज सही हैं तो जांच एजेंसियों के सामने कई महत्वपूर्ण बिंदु होंगे—किस खाते में रकम पहुंची, खाताधारक कौन है, रकम कितनी थी, कितनी बार लेनदेन हुआ और क्या इन लेनदेन का संबंध कथित ‘मंथली’ से था?
हालांकि केवल स्क्रीनशॉट या ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड से यह स्वतः साबित नहीं होता कि पैसा किस उद्देश्य से भेजा गया था।
इसके लिए बैंक रिकॉर्ड, खाताधारकों का विवरण, कॉल/मैसेज संबंधी उपलब्ध साक्ष्य, विभागीय रिकॉर्ड और संबंधित कर्मचारियों के बयान की जांच जरूरी होगी।
अब जांच पर टिकी निगाहें
शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
जिन अधिकारियों और कर्मचारियों पर आरोप लगाए गए हैं, उनका पक्ष भी जांच के दौरान सामने आना जरूरी है।
यदि आरोप गलत हैं तो जांच से स्थिति स्पष्ट होगी और यदि डिजिटल लेनदेन व अन्य साक्ष्यों से आरोपों की पुष्टि होती है तो मामला गंभीर विभागीय जांच का विषय बन सकता है।
अब बड़ा सवाल यही है—क्या उरई रोडवेज डिपो में कर्मचारियों से कथित नियमित पैसों के लेनदेन की कोई व्यवस्था थी, या फिर यह पूरा विवाद 23 सितंबर की बस चेकिंग के बाद पैदा हुआ?
इसका जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि डिजिटल ट्रांजैक्शन, बैंक रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज, विभागीय रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच से सामने आएगा।
वीडियो आखिर तक जरूर देखें और सुनें—जिलाधिकारी को ज्ञापन देने के बाद कैमरे के सामने पीड़ित ने आखिर क्या-क्या कहा।
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Jalaun, Jalaun | Sep 28, 2026