
दोनों हाथ खो देने के बाद ज़्यादातर लोग यही मान लेते हैं कि अब रोज़मर्रा के कई काम हमेशा के लिए मुश्किल हो जाएंगे। लेकिन एक व्यक्ति ने दुनिया को दिखा दिया कि तकनीक इंसानी सीमाओं को कितना आगे ले जा सकती है।
अमेरिका में रहने वाले लेस बॉग ने इतिहास रच दिया। उन्होंने बिना किसी रिमोट, जॉयस्टिक या हाथ से पकड़ने वाले कंट्रोलर के, दो मॉड्यूलर कृत्रिम हाथों को एक साथ चलाकर दिखाया।
यह किसी जादू से नहीं हुआ था।
इससे पहले उनकी Targeted Muscle Reinnervation, यानी TMR सर्जरी की गई थी। इस प्रक्रिया में हाथों को नियंत्रित करने वाली नसों को उनके कंधे और छाती की मांसपेशियों से जोड़ा गया। जब वे सिर्फ़ अपने हाथ हिलाने का इरादा करते थे, तो दिमाग से निकले तंत्रिका संकेत उन मांसपेशियों तक पहुंचते थे।
फिर उन मांसपेशियों पर लगे सेंसर इन संकेतों को पढ़ते और तुरंत कृत्रिम हाथों तक पहुंचा देते। नतीजा यह हुआ कि दोनों कृत्रिम हाथ लगभग एक साथ हरकत करने लगे।
इस तकनीक की मदद से लेस बॉग ने ऐसी गतिविधियां करके दिखाईं, जिनके लिए दोनों हाथों का तालमेल ज़रूरी होता है। यह उस समय कृत्रिम अंगों की दुनिया में एक बड़ी उपलब्धि मानी गई।
लेकिन यहां एक बात समझना बहुत ज़रूरी है। यह तकनीक सीधे दिमाग में चिप लगाए जाने वाली ब्रेन इम्प्लांट तकनीक नहीं थी। इसमें दिमाग के आदेश पहले नसों के ज़रिए मांसपेशियों तक पहुंचे, और फिर सेंसर ने उन्हें पढ़कर कृत्रिम हाथों को नियंत्रित किया।
इसके बाद वैज्ञानिकों ने ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफ़ेस पर भी काम आगे बढ़ाया, जहां मस्तिष्क के संकेतों को और भी सीधे तरीके से पढ़ने के सफल प्रयोग किए गए।
यह उपलब्धि सिर्फ़ रोबोटिक हाथ चलाने की कहानी नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब न्यूरोसाइंस और इंजीनियरिंग साथ आते हैं, तो खोई हुई क्षमताओं को भी नई तकनीक के सहारे वापस पाने की उम्मीद पैदा हो सकती है।
#Neuroscience #Prosthetics #BrainTechnology #Innovation #Science
Bihar, India | Aug 3, 2026