
पाकिस्तान की बदली सैन्य रणनीति और भारत के लिए नई चुनौती?
पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण को 28 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 28 मई 1998 को पाकिस्तान ने चागई परमाणु परीक्षण के तहत बलूचिस्तान के चागई क्षेत्र में परमाणु परीक्षण किया था। इससे कुछ दिन पहले भारत ने पोखरण-II परमाणु परीक्षण को अंजाम दिया था। तब से दक्षिण एशिया में परमाणु संतुलन और सुरक्षा को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।
परमाणु हथियार और 'डेटरेंस' की रणनीति
कई वर्षों तक पाकिस्तान की सुरक्षा नीति का आधार परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Deterrence) रहा। पाकिस्तान का मानना था कि उसके परमाणु हथियार भारत को किसी बड़े सैन्य अभियान से रोकने में सक्षम होंगे। इसी वजह से दोनों देशों के बीच तनाव के बावजूद पूर्ण युद्ध की स्थिति नहीं बनी।
हालांकि, भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि आतंकवाद और सीमा पार से होने वाले हमलों को परमाणु हथियारों की आड़ में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली बहस
भारत द्वारा किए गए कथित "ऑपरेशन सिंदूर" के बाद सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा तेज हुई कि क्या पाकिस्तान की पारंपरिक "न्यूक्लियर डेटरेंस" रणनीति पहले जैसी प्रभावी रह गई है। भारत ने यह संकेत दिया कि आतंकवादी हमलों की स्थिति में वह जवाबी कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखता है।
रॉकेट फोर्स पर पाकिस्तान का फोकस
हाल के वर्षों में पाकिस्तान ने अपनी मिसाइल और रॉकेट क्षमता को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान अब केवल परमाणु प्रतिरोध पर निर्भर रहने के बजाय पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को भी मजबूत कर रहा है। इसी संदर्भ में रॉकेट फोर्स और मिसाइल इकाइयों के विस्तार को देखा जा रहा है।
पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान ने कई मिसाइल परीक्षण किए हैं, जिन्हें उसकी सैन्य तैयारी और रणनीतिक क्षमता बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संतुलन
भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु संपन्न देश हैं। ऐसे में किसी भी सैन्य तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु हथियारों की मौजूदगी के बावजूद दोनों देशों के बीच किसी भी संघर्ष में पारंपरिक सैन्य शक्ति, मिसाइल क्षमता, साइबर युद्ध और खुफिया तंत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
क्या परमाणु टकराव की आशंका है?
सुरक्षा विशेषज्ञों का सामान्य आकलन है कि दोनों देशों के बीच सीधे परमाणु युद्ध की संभावना बेहद कम है, क्योंकि इसके परिणाम विनाशकारी होंगे। हालांकि सीमित सैन्य कार्रवाई, मिसाइल हमले, सीमा पर तनाव और आतंकवाद विरोधी अभियानों जैसे मुद्दे भविष्य में भी दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं।
दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए यह आवश्यक माना जाता है कि दोनों देश सैन्य तैयारियों के साथ-साथ संवाद, कूटनीति और संकट प्रबंधन तंत्र को भी मजबूत बनाए रखें।
Chapra, Saran | Jun 3, 2026