
श्री कृष्ण ही सर्वोपरि और एक मात्र सत्य हैं - पं ०भरत उपाध्याय
वंशी-विभूषित-करात् नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुण-बिम्ब-फलाधरोष्ठात्।
पूर्णेन्दु-सुन्दर-मुखादरविन्द-नेत्रात् कृष्णात् परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥
"जिनके हाथ सुंदर बांसुरी (वंशी) से सुशोभित हैं, जिनके शरीर की कांति (आभा) नवीन जल से भरे हुए काले मेघ (बादल) के समान दिव्य है, जो दैदीप्यमान पीला वस्त्र (पीताम्बर) धारण किए हुए हैं, जिनके ओष्ठ (होठ) पके हुए लाल बिंबाफल के समान लाल हैं, जिनका मुख पूर्ण चंद्रमा के समान अत्यंत सुंदर है और जिनकी आँखें खिले हुए कमल (अरविंद) के समान विशाल हैं—उन साक्षात् परम ब्रह्म श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मैं किसी अन्य परम तत्व को नहीं जानता (अर्थात् मेरे लिए श्रीकृष्ण ही सर्वोपरि और एकमात्र सत्य हैं)।" यह श्लोक जिस महान संत ने लिखा है, उनका नाम *स्वामी मधुसूदन सरस्वती* था। वे १६ वीं शताब्दी के काशी (वाराणसी) के सबसे प्रकांड विद्वान, अद्वैत वेदांत के परम आचार्य और सन्यासी थे। उनके जीवन और इस श्लोक के पीछे की कथा ज्ञान और भक्ति के सुंदर मिलन की एक अद्भुत मिसाल है।
कथा: जब परम ज्ञानी को हुआ भक्ति का अहसास
स्वामी मधुसूदन सरस्वती अद्वैत वेदांत के इतने बड़े ज्ञाता थे कि वे मानते थे कि *"ब्रह्म सत्य है और यह संसार मिथ्या है।"* उनके अनुसार ईश्वर का कोई रूप नहीं होता, वे निराकार हैं (निर्गुण ब्रह्म)। वे केवल ध्यान और ज्ञान मार्ग पर चलते थे और मूर्ति पूजा या साकार भगवान की भक्ति को ज्ञान से छोटा समझते थे।वे काशी में बैठकर बड़े-बड़े विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराते थे। वे अपने ज्ञान के अहंकार में नहीं, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता के चरम पर थे।
लेकिन जीवन में आया एक नया मोड़
एक बार वे वृंदावन गए। वहाँ के शांत वातावरण, संतों की यमुना किनारे लगी मंडलियों और चारों ओर गूंजते 'राधे-कृष्ण' के भजनों ने उनके भीतर कुछ बदल दिया। जब उन्होंने वृंदावन में श्री बांके बिहारी और भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह के दर्शन किए, तो उनका वह कठोर ज्ञान मार्ग पिघलने लगा। उन्हें अहसास हुआ कि जिस निराकार ब्रह्म को वे किताबों और ध्यान में ढूंढ रहे थे, वह साक्षात् रस रूप होकर वृंदावन की गलियों में मुरली बजा रहा है।
श्रीकृष्ण की दिव्य छवि (सांवल रूप, पीताम्बर, बांसुरी) उनके हृदय में इस कदर बस गई कि वे पूरी तरह भाव-विभोर हो गए।
इस श्लोक का जन्म
वृंदावन से लौटने के बाद, उन्होंने अद्वैत वेदांत का एक बहुत ही कठिन और प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा, जिसका नाम था *'सिद्धान्तबिन्दु'।* चूंकि वे एक अद्वैत वेदांती थे, इसलिए नियम के अनुसार उन्हें ग्रंथ की शुरुआत (मंगलाचरण) में किसी निराकार तत्व की स्तुति करनी चाहिए थी। लेकिन उनका दिल तो श्रीकृष्ण की भक्ति में डूब चुका था।शास्त्रों के नियमों और अपनी आंतरिक भक्ति का संतुलन बनाते हुए उन्होंने ग्रंथ की शुरुआत में ही यह श्लोक लिख दिया
"कृष्णात् परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥" .....
इसका संदेश यह था:
"भले ही मैं दुनिया को ज्ञान सिखाता हूँ और निराकार ब्रह्म की बातें करता हूँ, लेकिन जब अनुभव की बात आती है, तो उस वंशी बजाने वाले सांवले कृष्ण के अलावा मैं किसी और सत्य को नहीं जानता।"
इस प्रकार, एक परम ज्ञानी सन्यासी ने दुनिया के सामने यह साबित किया कि ज्ञान की अंतिम सीमा भी भगवान की अनन्य भक्ति में जाकर ही समाप्त होती है।
*नारायण! नारायण!! नारायण!!!*