
आज से ठीक एक साल पहले, चौसा की मिट्टी ने अपना एक वीर सपूत खो दिया था। सुनील सिंह देश की रक्षा करते हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शहीद हो गए थे। उस दिन पूरे इलाके की आंखें नम थीं, हर जुबान पर उनके साहस और बलिदान की चर्चा थी। नेताओं के काफिले पहुंचे, बड़े-बड़े वादे हुए, शहीद के परिवार को हर संभव सहायता और सम्मान देने की बातें कही गईं।
लेकिन एक साल बीत गया।
समय के साथ कैमरे चले गए, भाषण खत्म हो गए, मंच सिमट गए और वादों की आवाज भी धीमी पड़ गई। आज भी शहीद का परिवार उसी दर्द के साथ जी रहा है, जिसके साथ उसने अपने बेटे, भाई और पति को देश के लिए खोया था। शहादत का सम्मान केवल श्रद्धांजलि देने से नहीं होता, बल्कि उन वादों को निभाने से होता है जो उस परिवार से किए गए थे।
जब हम चैन की नींद सोते हैं, तब किसी मां की आंखें अपने शहीद बेटे की तस्वीर देखकर भर आती हैं। किसी बच्चे को आज भी अपने पिता की कमी महसूस होती है। किसी पत्नी के लिए समय वहीं ठहर गया है, जिस दिन तिरंगे में लिपटा उसका अपना घर लौटा था।
सुनील सिंह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उस बलिदान का प्रतीक हैं जिसके कारण हम सुरक्षित हैं। उनकी शहादत को याद रखना और उनके परिवार के साथ किए गए वादों को पूरा करना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
शहीद कभी मरते नहीं, लेकिन उन्हें भूल जाना समाज की सबसे बड़ी हार होती है। 🇮🇳🙏
Buxar, Buxar | Jun 7, 2026