
भारतीय संस्कृति विविधता, सहिष्णुता और आपसी सद्भाव को भी मजबूत करती हैं : समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया
समर्थगुरु धारा हिमाचल प्रदेश के स्टेट कोऑर्डिनेटर आचार्य कुंजबिहारी और समर्थगुरु धारा हिमाचल प्रदेश के शिक्षा कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि समर्थगुरु धाम, मुरथल के संस्थापक समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी के सान्निध्य में 12 अक्टूबर से 17 अक्टूबर 2026 तक बिहार के रोहतास जिले के ऐतिहासिक कर्मा गाँव में आयोजित कर्मा महोत्सव में भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं और आध्यात्मिक चेतना का अनूठे संगम का साक्षी बना।
लोक संगीत, पारंपरिक नृत्य और आध्यात्मिक भावनाओं से वातावरण सराबोर हो गया।
उपमन्यु के जीवन पर आधारित नाट्य हमें सिखाती है कि सच्ची शिक्षा केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि सेवा, अनुशासन, धैर्य और अनुभव से भी प्राप्त होती है। गुरु-शिष्य संबंध का वास्तविक उद्देश्य केवल आज्ञा पालन नहीं, बल्कि शिष्य के भीतर ज्ञान, विवेक, चरित्र और आत्मबोध का विकास करना है।
कई राज्यों से आए लोगों के साथ स्थानीय श्रद्धालुओं ने समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया से श्रद्धापूर्वक माला दीक्षा भी ग्रहण की।
संस्कृति और अध्यात्म का संगम है कर्मा धाम :
कर्मा महोत्सव को संबोधित करते हुए समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध परंपराओं को एक सूत्र में पिरोने का संदेश ही कर्मा धाम का उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि जब किसी सांस्कृतिक केंद्र में अध्यात्म प्रतिष्ठित होता है, तो उसकी ऊँचाई और प्रभाव युगों तक अक्षुण्ण रहते हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशेषता को उसकी विविधता, सहिष्णुता और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ते हुए कहा कि सांस्कृतिक परंपराएँ लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं। आपसी सद्भाव को भी मजबूत करती हैं।
निजामुद्दीन औलिया के प्रसंगों ने बाँधा समां :
सांस्कृतिक संध्या का प्रमुख आकर्षण सूफी परंपरा पर आधारित नाट्य प्रस्तुति रही। कलाकारों ने हजरत निजामुद्दीन औलिया और उनके अनन्य शिष्य अमीर खुसरो के जीवन से जुड़े प्रसंगों को मंच पर सजीव रूप में प्रस्तुत किया। गुरु-शिष्य के आध्यात्मिक सं बंध, समर्पण, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। मंचन के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि प्रेम, करुणा और आपसी सम्मान किसी भी समाज की वास्तविक ताकत हैं, भाषा और क्षेत्र की विविधताओं के बावजूद मानवीय संबंध लोगों को एक सूत्र में बाँध सकते हैं।
कलाकारों ने सूफी परंपरा की इसी उदार भावना को अपने अभिनय के माध्यम से सामने रखा। प्रस्तुति के दौरान परिसर तालियों से गूँजता रहा।
आज ट्विटर के माध्यम से समर्थगुरु धाम, मुरथल के संस्थापक समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया जी ने बताया कि
सूफ़ी बाबा शाह क़लंदर हमारे परम गुरू हैं, आकाशदीप हैं, संरक्षक हैं, स्तंभ हैं। उनकी पावन स्मृति और नज़र हमारी पूँजी है। जलवागर चला गया, लेकिन उसके जलवे से आज भी मैं लबरेज़ महसूस करता हूँ।