
निवर्तमान निगम महापौर राकेश पाठक की बढ़ीं मुश्किलें, हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश
184 पुनर्वास भूखंडों के बहुचर्चित मामले में गैर-समुदाय को हुए हस्तांतरण निरस्त, नगर निकाय विभाग को तथ्यात्मक जांच के निर्देश
भीलवाड़ा (महेन्द्र नागौरी) शहर के बहुचर्चित कीरखेड़ा गाड़िया लुहार पुनर्वास भूखंड प्रकरण में राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने बड़ा फैसला सुनाते हुए निवर्तमान नगर निगम महापौर राकेश पाठक की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अदालत ने महापौर राकेश पाठक, उनकी पत्नी अलका पाठक एवं परिवार के सदस्यों पर लगे भूखंड खरीद के आरोपों की स्वतंत्र एवं तथ्यात्मक जांच कराने के निर्देश दिए हैं। साथ ही नगर निकाय विभाग को छह माह के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने के आदेश दिए गए हैं।
खंडपीठ ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट कर दिया कि गाड़िया लुहार समुदाय के पुनर्वास के उद्देश्य से आवंटित 184 आवासीय भूखंडों का समुदाय से बाहर किसी भी व्यक्ति के नाम किया गया हस्तांतरण योजना की मूल भावना के विपरीत है। ऐसे सभी हस्तांतरण निरस्त माने जाएंगे तथा संबंधित भूखंड राज्य सरकार अथवा स्थानीय निकाय में पुनः निहित होंगे।
20 साल पुराने पुनर्वास प्रकरण ने फिर पकड़ा तूल
वर्ष 2005 में भीलवाड़ा के कीरखेड़ा क्षेत्र में गाड़िया लुहार समुदाय के स्थायी पुनर्वास के लिए 184 आवासीय भूखंड 99 वर्ष की लीज पर निःशुल्क आवंटित किए गए थे। योजना का उद्देश्य घुमंतू एवं अर्धघुमंतू परिवारों को स्थायी आवास उपलब्ध कराकर मुख्यधारा से जोड़ना था। आवंटन पत्र में स्पष्ट शर्त थी कि इन भूखंडों का विक्रय या हस्तांतरण नहीं किया जाएगा।
याचिका में आरोप लगाया गया कि वर्ष 2022 में जारी प्रशासनिक आदेशों की कथित गलत व्याख्या कर इन भूखंडों के नामांतरण की अनुमति दे दी गई, जिसके बाद कई भूखंड प्रभावशाली लोगों तक पहुंच गए। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि इस प्रक्रिया का लाभ उठाते हुए तत्कालीन नगर परिषद सभापति एवं वर्तमान महापौर राकेश पाठक के परिवार के नाम भी भूखंड पहुंचे।
कोर्ट ने माना, आरोपों की जांच जरूरी:-
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि यदि भूखंडों के हस्तांतरण में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो उसकी जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। वहीं राकेश पाठक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने सभी आरोपों को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित बताते हुए उनका खंडन किया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि याचिका में लगाए गए आरोप स्वतंत्र जांच की मांग करते हैं। अदालत ने नगर निकाय विभाग को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर छह माह के भीतर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
अपने फैसले में खंडपीठ ने कहा कि गाड़िया लुहार योजना जैसी पुनर्वास योजनाएं सामाजिक न्याय की भावना से बनाई जाती हैं। इनका उद्देश्य गरीब और वंचित समुदाय को स्थायी आवास उपलब्ध कराना है, न कि सार्वजनिक संपत्ति को निजी लाभ का माध्यम बनने देना। अदालत ने कहा कि यदि कल्याणकारी योजनाओं के भूखंड आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के हाथों में चले जाते हैं तो संविधान की सामाजिक न्याय की अवधारणा ही विफल हो जाएगी।
भविष्य के लिए भी तय की नई व्यवस्था:-
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि भविष्य में गाड़िया लुहार योजना के किसी भी भूखंड का हस्तांतरण केवल गाड़िया लुहार समुदाय के वास्तविक सदस्य के पक्ष में ही किया जा सकेगा। समुदाय से बाहर किसी भी व्यक्ति के नाम विक्रय, उपहार, नामांतरण या किसी भी प्रकार का अधिकार हस्तांतरण स्वतः शून्य माना जाएगा और संबंधित भूखंड पुनः राज्य सरकार अथवा स्थानीय निकाय में निहित होगा।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल:-
बहुचर्चित भूखंड प्रकरण में आए इस फैसले के बाद भीलवाड़ा की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। नगर निकाय विभाग की प्रस्तावित जांच अब पूरे प्रकरण की परतें खोलेगी। निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच में किन अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और लाभार्थियों की भूमिका सामने आती है तथा उनके विरुद्ध क्या कार्रवाई होती है।