
लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया (प्रेस) हैं। ये चारों मिलकर देश में शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाते हैं.. और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं। इन इनमें से तीन स्तंभ विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका इन तीनों को सरकार सैलरी , पेंशन , गुजारा भत्ता सब कुछ देती है । जबकि प्रेस मीडिया को कोई सैलरी नहीं है । Main स्ट्रीम को छोड़कर.. आज के युग में 100 में 90 प्रतिशत पत्रकार सिस्टम के हाथों बिक जाता है , नेता , विधायक सांसद , मंत्री के तलवे चाटता है. जी हजूरी करता है चापलूसी करता है की कुछ आ जाए.. शायद यह उनकी मजबूरी रहती है.. जब स्वतंत्र मीडिया आपके लिए लड़ती है तो.. उनको कभी सरकार पैसा देगी ? नहीं देगी...क्या आम आवाम पत्रकारों के बारे में सोचती है उनका घर कैसे चलता है.. लोगों के मन में एक सोच हमेशा बनी रहती है कि.. पत्रकारों के पास पैसा बहुत होता है..जाहिर सी बात है जो नेताओं की जी हुजूरी करेगा उसके पास तो पैसा रहेगा ही ना.. लेकिन जिनके पास नहीं है उनके बारे में भी तो आप कहां सोचते हैं.. उनका भी अपना पर्सनल लाइफ है... बाल बच्चे मां-बाप घर परिवार है कभी सोचा है आपने की कैसे चलता होगा... कमाने का एक माध्यम विज्ञापन है.. जो कॉर्पोरेट सेक्टर से मिलती है किसी बिजनेसमैन से मिलता है.. यह बिजनेसमैन भी कहीं ना कहीं सरकार का ही एक अंग होता है.. या ये समझिए सरकार को चलाने का काम बिजनेसमैन के हाथों में ही है.. तो फिर हम उनके खिलाफ कैसे जा सकते हैं जरा सोचिए.. और यही एक सिस्टम बना हुआ है जो कोई पत्रकार अपना दर्द साझा नहीं करता है..
खबर स्वतंत्र तभी होगा जब जनता के पैसों से न्यूज़ चैनल चलेगी । आपके लिए कोई पत्रकार 100 किलोमीटर गाड़ी चला कर आपके घर पर पहुंच जाता है आपकी आवाज उठाने के लिए.. आप कभी पूछते हैं कि...आपकी गाड़ी में तेल है कि नहीं आपने खाना खाया कि नहीं.. आपको लगता है की न्यूज़ चैनल से आया है.. बहुत बड़ा आदमी है खूब पैसा कमाता है.. और वही पत्रकार उस खबर को दबाने के लिए नेता , अधिकारी , माफियाओं से पैसा ले लेता है और खबर को दबा दिया जाता है । और आपको लगता है कि पत्रकार बिक गया.. जब पूरा समाज ही अवसरवादी है तो फिर अधिकारी , पदाधिकारी , पत्रकार क्यों नहीं.. वह भी तो अवसरवादी ही बनेगा..?
Purnea East, Purnia | Sep 11, 2026