
उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा विभाग में कथित फर्जी शिक्षक नियुक्तियों के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने सभी बेसिक शिक्षकों को अपने नियुक्ति पत्र और शैक्षणिक प्रमाणपत्र जमा करने का निर्देश दिया है। इन दस्तावेजों की जांच की जाएगी। आदेश के अनुसार, शिक्षकों को एक सप्ताह के भीतर आवश्यक अभिलेख जमा करने होंगे।
खबर के मुताबिक, न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने कुसुमलता श्रीवास्तव की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फर्जी नियुक्तियों की समस्या केवल हाल में हुई भर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों से ऐसे मामले सामने आते रहे हैं।
सुनवाई के दौरान विशेष जांच दल की जांच में बड़ी संख्या में कथित फर्जी शिक्षक नियुक्तियों का मामला सामने आने का उल्लेख किया गया। याचिका में गोरखपुर के कैंपियरगंज क्षेत्र के एक विद्यालय में तैनात सहायक अध्यापिका कुसुमलता श्रीवास्तव के शैक्षणिक दस्तावेजों के इस्तेमाल का मामला भी उठाया गया है।
कोर्ट ने कहा कि फर्जी नियुक्तियों का असर केवल सरकारी व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। विद्यालयों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए योग्य और वैध रूप से नियुक्त शिक्षकों की मौजूदगी जरूरी है।
अदालत ने मामले में नियुक्ति प्रक्रिया और दस्तावेजों के सत्यापन से जुड़े पहलुओं पर गंभीरता दिखाई। आदेश के अनुपालन में शिक्षकों को अपने नियुक्ति पत्र, शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्र और संबंधित अभिलेख प्रस्तुत करने होंगे, ताकि उनकी वैधता की जांच की जा सके।
मामले में आगे की सुनवाई चार नवंबर 2026 को निर्धारित होने का उल्लेख खबर में किया गया है। कोर्ट के निर्देश के बाद बेसिक शिक्षा विभाग में दस्तावेजों के सत्यापन और कथित फर्जी नियुक्तियों की जांच को लेकर हलचल बढ़ने की संभावना है।
इस मामले का अहम पहलू यह है कि फर्जी नियुक्तियों की जांच को केवल हालिया भर्ती तक सीमित न रखकर पुराने मामलों की भी पड़ताल करने पर जोर दिया गया है। हालांकि, दस्तावेज जमा करने का निर्देश अपने आप में किसी शिक्षक की नियुक्ति को फर्जी साबित नहीं करता। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायालय की आगे की कार्यवाही के आधार पर ही निकलेगा।
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