
2006 के मालेगांव बम धमाका मामले में सुप्रीम कोर्ट से उन मुस्लिम नौजवानों को बड़ी कानूनी राहत मिली है, जिन्हें साल 2016 में इस केस से बाइज्जत डिस्चार्ज (बरी) कर दिया गया था। जमीयत उलेमा महाराष्ट्र (अरशद मदनी) की मजबूत कानूनी पैरवी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में इन मुस्लिम नौजवानों के खिलाफ की गई टिप्पणियां उनके लंबित मुकदमों पर कोई असर नहीं डालेंगी।
क्या है पूरा मामला?
पिछले महीने बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले के चार आरोपियों—राजेंद्र चौधरी, मनोहर रामसिंह नरवरिया, धान सिंह और लोकेश शर्मा को केस से डिस्चार्ज कर दिया था, जबकि निचली अदालत में उन पर आरोप तय हो चुके थे। हाईकोर्ट ने अपने इसी फैसले में 2016 में डिस्चार्ज किए जा चुके 9 मुस्लिम नौजवानों (नूरुल हुदा, मोहम्मद अली शेख, आसिफ बशीर, मोहम्मद जाहिद, रईस अहमद आदि) का पक्ष सुने बिना ही उनके खिलाफ कुछ प्रतिकूल टिप्पणियां कर दी थीं। गौरतलब है कि इन 9 मुस्लिम नौजवानों की रिहाई के खिलाफ महाराष्ट्र एटीएस (ATS) और धान सिंह वगैरह की अपील पहले से ही हाईकोर्ट में चल रही है।
सुप्रीम कोर्ट में आज क्या हुआ?
1 अक्टूबर 2026 को जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल पंचोली की दो सदस्यीय बेंच के सामने सीनियर एडवोकेट शादान फरासत और नित्या रामाकृष्णन ने जिरह की।
एडवोकेट शादान फरासत की दलीलों पर सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ आदेश दिया कि बॉम्बे हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणियों का असर मुस्लिम नौजवानों के खिलाफ चल रही अपीलों पर नहीं पड़ेगा और हाईकोर्ट बिना प्रभावित हुए मेरिट के आधार पर फैसला करेगा।
वहीं, सीनियर एडवोकेट नित्या रामाकृष्णन ने धमाका पीड़ितों की ओर से राजेंद्र चौधरी समेत चार आरोपियों को डिस्चार्ज किए जाने के फैसले को चुनौती दी। कोर्ट ने इस मसले पर अगले हफ्ते बहस करने का निर्देश दिया है।
एनआईए (NIA) के दोहरे रवैये पर सवाल
जमीयत उलेमा महाराष्ट्र के अध्यक्ष मौलाना हलीमुल्लाह कासमी ने इसे 'आंशिक कामयाबी' बताते हुए कहा कि मौलाना अब्दुल कय्यूम के माध्यम से पीड़ितों और बरी हुए नौजवानों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में चार याचिकाएं (SLP) दाखिल की गई थीं। उन्होंने जांच एजेंसी NIA की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। मौलाना कासमी ने कहा कि जिस तरह NIA ने 2008 मालेगांव धमाकों में बरी किए गए आरोपियों के खिलाफ अब तक अपील नहीं की है, वैसे ही 2006 के मामले में भी एजेंसी से उम्मीद कम ही थी, इसलिए खुद बम धमाका पीड़ितों को इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।
याद रहे कि 8