
निगम चुनाव से पहले भाजपा में टिकट को लेकर घमासान, विट्ठल शंकर अवस्थी बोले- ‘बगावतखोरों को नहीं मिलेगा टिकट’
नेताओं के घरों पर कार्यकर्ताओं की आवाजाही बढ़ी, टिकट वितरण से पहले खेमेबंदी ने बढ़ाई सियासी गर्मी; आलाकमान के समन्वय प्रयासों के बीच बयानों ने बढ़ाई बेचैनी
भीलवाड़ा (महेन्द्र नागौरी) नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, भीलवाड़ा की सियासत में टिकटों को लेकर घमासान तेज होता जा रहा है। भाजपा में संभावित प्रत्याशियों को लेकर अंदरखाने चल रही खींचतान अब बयानों के जरिए सतह पर आने लगी है। पूर्व विधायक एवं हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे विट्ठल शंकर अवस्थी के ‘बगावतखोरों को टिकट नहीं मिलेगा’ वाले बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।
एक ओर पार्टी का प्रदेश नेतृत्व विभिन्न गुटों के बीच समन्वय स्थापित कर चुनावी मैदान में एकजुटता का संदेश देने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर टिकट को लेकर नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता लगातार बढ़ रही है। भाजपा से जुड़े कई कार्यकर्ता संभावित दावेदारों और प्रमुख नेताओं के घरों पर पहुंचकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं। इससे साफ है कि चुनावी टिकट की दौड़ अब धीरे-धीरे खुलकर सामने आने लगी है।
अवस्थी के बयान ने बढ़ाई सियासी गर्मी
विट्ठल शंकर अवस्थी का बयान ऐसे समय आया है, जब भाजपा के सामने निगम चुनाव में सबसे बड़ी चुनौती संगठन की:- एकजुटता बनाए रखने की है। उनके बयान को पार्टी के भीतर अनुशासन और निष्ठा के सवाल से जोड़कर देखा जा रहा है। खासकर उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह संदेश माना जा रहा है, जिन्होंने पिछले चुनावों में पार्टी लाइन से अलग जाकर राजनीतिक गतिविधियां की थीं।
हालांकि, बयान के बाद पार्टी के भीतर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाओं की चर्चा है। एक वर्ग इसे संगठनात्मक अनुशासन के पक्ष में जरूरी सख्ती मान रहा है, तो दूसरे वर्ग में यह सवाल उठ रहा है कि टिकट वितरण के समय पुराने राजनीतिक मतभेदों का असर कितना पड़ेगा।
निर्दलीय विधायक के साथ खड़ा धड़ा भी अहम
भीलवाड़ा की स्थानीय राजनीति में निर्दलीय विधायक के साथ खड़े भाजपा समर्थक नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका भी चुनाव में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे कार्यकर्ताओं में से कुछ को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि टिकट वितरण के समय उनका रुख निर्णायक हो सकता है। मध्यमार्गी कार्यकर्ताओं में भी टिकटों को लेकर उत्सुकता और बेचैनी बढ़ रही है।
यदि टिकट वितरण में किसी प्रमुख गुट की अनदेखी हुई या असंतोष खुलकर सामने आया तो चुनावी मुकाबले के समीकरण बदल सकते हैं। भाजपा के सामने चुनौती केवल जीतने योग्य प्रत्याशियों का चयन करने की नहीं, बल्कि टिकट के बाद संभावित बगावत और असंतोष को संभालने की भी होगी।
सांसद अग्रवाल ने संभाला मोर्चा
वहीं भाजपा सांसद दामोदर अग्रवाल ने अपेक्षाकृत संयमित भाषा का इस्तेमाल करते हुए विवाद को शांत रखने की कोशिश की है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ओर से लगातार यह प्रयास किया जा रहा है कि निगम चुनाव में संगठन एकजुट होकर मैदान में उतरे और व्यक्तिगत मतभेद चुनावी रणनीति पर हावी न हों।
लेकिन अवस्थी के तेवरों ने संकेत दे दिए हैं कि टिकट वितरण की राह आसान नहीं रहने वाली। अब असली परीक्षा पार्टी नेतृत्व की होगी कि वह विभिन्न राजनीतिक धड़ों के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसे प्रत्याशियों का चयन कैसे करता है, जिन्हें संगठन और स्थानीय कार्यकर्ताओं दोनों का समर्थन मिल सके।
टिकटों की घोषणा के बाद साफ होगी तस्वीर:-
फिलहाल नेताओं के घरों पर कार्यकर्ताओं की आवाजाही, संभावित दावेदारों की सक्रियता और अंदरखाने चल रही बैठकों ने चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है। टिकट के दावेदार अपनी-अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने में जुटे हैं। ऐसे में टिकट किसे मिलता है और किसका पत्ता कटता है, यह आने वाले दिनों में भाजपा की स्थानीय राजनीति की दिशा तय करेगा।
यदि टिकट वितरण के बाद असंतोष दबा नहीं और बगावत या निर्दलीय प्रत्याशियों के रूप में सामने आया, तो नगर निगम चुनाव का मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है। फिलहाल भाजपा के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही है—संगठन की एकजुटता भारी पड़ेगी या टिकट की राजनीति में गुटीय समीकरण?