
नमस्कार... चित्रकूट में आई भीषण बाढ़ के दौरान हर कोई अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभा रहा था। प्रशासन था, राहत टीमें थीं, समाजसेवी थे... लेकिन एक और चेहरा था, जो हर गांव, हर कस्बे, हर डूबे हुए रास्ते और हर पीड़ित परिवार तक पहुंच रहा था... वो था पत्रकार।
कैमरा कंधे पर, हाथ में माइक और दिल में सिर्फ एक जिम्मेदारी... सच को लोगों तक पहुंचाना।
शायरी 1:
जो खुद भीगकर दूसरों का दर्द दिखाता रहा, हर मुश्किल में सच का दीप जलाता रहा। उसकी मेहनत का हिसाब कौन करेगा, जो हर हाल में अपना फर्ज निभाता रहा।
बाढ़ के दिनों में पत्रकार पानी के बीच उतरकर खबरें दिखाते रहे। कहीं नाव से, कहीं कमर तक पानी में, तो कहीं जान जोखिम में डालकर लोगों की आवाज सरकार और समाज तक पहुंचाई।
लेकिन सवाल यह है कि... क्या किसी ने उन पत्रकारों से पूछा कि वे कैसे हैं? क्या किसी ने पूछा कि उन्होंने खाना खाया या नहीं? क्या किसी ने एक गिलास पानी तक दिया?
सरकारी अधिकारियों के पास सरकारी वाहन हैं, ईंधन की व्यवस्था है, सुरक्षा है, इलाज की सुविधा है... लेकिन पत्रकारों के पास क्या था? सिर्फ अपना हौसला... और अपनी जिम्मेदारी।
शायरी 2:
तूफानों से लड़ना जिनकी पहचान रही, सच की राह ही उनकी शान रही। सबका दर्द दुनिया तक पहुंचाते रहे, मगर उनकी तकलीफ अक्सर अनजान रही।
बाढ़ खत्म हुई... राहत कार्यों की चर्चा हुई... सम्मान समारोह हुए... लेकिन उन पत्रकारों का कहीं जिक्र नहीं हुआ, जिन्होंने सबसे पहले हर दर्द को कैमरे में कैद कर दुनिया तक पहुंचाया।
ये सम्मान की मांग नहीं... बल्कि उस मेहनत और समर्पण को याद करने की एक छोटी-सी कोशिश है।
शायरी 3:
कलम बिकती नहीं, हालात से लड़ती है, हर मुश्किल में सच की मशाल बनती है। जो खुद दर्द सहकर खबरें लिखता है, वही पत्रकार समाज की आवाज बनती है।
क्लोजिंग:
आज जरूरत है कि समाज और प्रशासन उन पत्रकारों की मेहनत को भी सम्मान दे, जो बिना किसी विशेष सुविधा के, बिना सुरक्षा के और बिना किसी अपेक्षा के, हर संकट में सबसे पहले मौके पर पहुंचते हैं।
क्योंकि... जब पूरा शहर घरों में सुरक्षित था, तब पत्रकार बाढ़ के पानी में खड़े होकर सच दिखा रहे थे।
यही उनका कर्तव्य था... और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।