नेताओं के विकास दावों की खुली पोल! अस्पताल पहुंचने से पहले डंडी-कंडी में महिला ने तोड़ा दम
प्रसव के बाद महिला ने डंडी-कंडी में रास्ते में तोड़ा दम, सिस्टम की बदहाली पर उठे गंभीर सवाल
उत्तरकाशी/मोरी। पुरोला विधानसभा क्षेत्र के मोरी विकासखंड के गंगाड़ क्षेत्र से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने पहाड़ों में स्वास्थ्य और सड़क सुविधाओं की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों के अनुसार, ओसला गांव में प्रसव के बाद गंभीर रूप से बीमार हुई करीब 29 वर्षीय अमीना देवी पत्नी शंकर दास उर्फ बबलू दास को सड़क मार्ग तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को डंडी-कंडी का सहारा लेना पड़ा। रास्ते में महिला ने दम तोड़ दिया। बताया गया कि प्रसव के दौरान नवजात भी मृत पैदा हुआ।
ग्राम प्रधान ओसला रमेश मलाटा ने फोन पर घटना की जानकारी देते हुए गहरा दुख व्यक्त किया। घटना की सूचना मिलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई।
यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उन तमाम दावों पर बड़ा सवाल है जिनमें पहाड़ के गांवों तक सड़क, स्वास्थ्य और आपातकालीन सेवाएं पहुंचाने की बातें मंचों से बार-बार की जाती हैं।
बड़े-बड़े विकास के दावों के बीच डंडी-कंडी क्यों?
पुरोला विधानसभा में विकास के दावे करने वाले जनप्रतिनिधियों से अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी गर्भवती महिला की हालत प्रसव के बाद गंभीर हो जाए तो उसे अस्पताल तक पहुंचाने के लिए आज भी ग्रामीणों को पैदल डंडी-कंडी लेकर निकलना पड़े, तो आखिर वर्षों से किए जा रहे सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे किस जमीन पर खड़े हैं?
क्या पहाड़ के दुर्गम गांवों में रहने वाली महिलाओं की जिंदगी की कीमत मैदानी क्षेत्रों की महिलाओं से कम है?
क्या सरकार की जननी सुरक्षा, मातृत्व स्वास्थ्य, 108 एंबुलेंस और ग्रामीण सड़क जैसी योजनाएं केवल कागजों और सरकारी आंकड़ों तक सीमित हैं?
स्थानीय विधायक अपने क्षेत्र के विकास को लेकर लगातार उपलब्धियां गिनाते हैं। लेकिन अब जनता पूछ रही है—
क्या इस मौत की जिम्मेदारी तय होगी?
क्या यह जांच होगी कि महिला को समय पर चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिल सकी..?
अगर सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण किसी परिवार का चिराग बुझ जाए, तो मंचों से किए गए विकास के दावों की जवाबदेही आखिर किसकी होगी?
“जब जिंदगी और मौत के बीच सुविधा ही न हो, तो विकास के दावे आखिर किस काम के?”
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