11 सितंबर 1952 को अमेरिकी सर्जन डॉ. चार्ल्स हफनागेल ने मेडिकल इतिहास में एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने वॉशिंगटन डी.सी. के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में 30 साल की एक महिला के शरीर में एक कृत्रिम वाल्व लगाया। उसका प्राकृतिक महाधमनी वाल्व रूमेटिक फीवर के कारण खराब हो गया था, जिससे खून दिल की तरफ वापस जाने लगा था।
हफनागेल का बनाया वाल्व आज के कृत्रिम हार्ट वाल्व जैसा नहीं था। यह एक छोटी पारदर्शी प्लास्टिक ट्यूब थी, जिसके अंदर एक छोटी गेंद लगी थी। खून आगे जाता तो गेंद रास्ता खोल देती और वापस आने पर रास्ता बंद कर देती।
उस समय हार्ट-लंग बायपास मशीन उपलब्ध नहीं थी, इसलिए इसे सीधे दिल के वाल्व की जगह नहीं लगाया गया, बल्कि डिसेंडिंग एओर्टा में लगाया गया।
यह सफल प्रयोग आगे चलकर आधुनिक कृत्रिम हार्ट वाल्व सर्जरी के विकास की नींव बना।
मूल जानकारी: जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी, एनआईएच, नेशनल म्यूज़ियम ऑफ अमेरिकन हिस्ट्री
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Bihar, India | Sep 11, 2026