
हाईकोर्ट के आदेश, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और एसडीएम (न्यायिक) की चेतावनी के बीच जालौन बार का विरोध, अधिवक्ताओं के रवैये पर उठे गंभीर सवाल
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उरई। जिला जालौन बार एसोसिएशन द्वारा उपजिलाधिकारी (न्यायिक) श्री रिंकू सिंह राही की कार्यप्रणाली के विरोध में न्यायालय के कार्यों का बहिष्कार करने संबंधी प्रस्ताव के बाद विवाद और गहरा गया है। इस बीच एसडीएम (न्यायिक) कार्यालय की ओर से जारी सार्वजनिक सूचना तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों ने पूरे मामले को गंभीर कानूनी बहस के केंद्र में ला दिया है।
एसडीएम (न्यायिक) कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि न्यायालय की कार्यवाही पूरी तरह ऑनलाइन उपलब्ध है। यदि किसी अधिवक्ता को किसी टिप्पणी, आदेश या कार्यवाही पर आपत्ति है तो वह वीडियो की टाइमिंग अथवा पत्रावली संख्या के साथ लिखित शिकायत प्रस्तुत करें, ताकि उसका परीक्षण कर आवश्यक स्पष्टीकरण या सुधार किया जा सके। कार्यालय ने यह भी याद दिलाया कि माननीय जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में शिकायत निवारण समिति पहले से गठित है और वैधानिक मंच उपलब्ध होने के बावजूद सीधे हड़ताल का रास्ता अपनाना न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने का संकेत माना जा सकता है।
कार्यालय ने यह भी चेतावनी दी कि हाईकोर्ट के आदेशों के अनुपालन में न्यायालय का बहिष्कार करने वाले अधिवक्ताओं की सूची तैयार कर अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उच्च स्तर पर भेजी जाएगी।
उधर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा है कि अधिवक्ताओं द्वारा न्यायिक कार्य से विरत रहना या हड़ताल का आह्वान प्रथम दृष्टया अवमानना का विषय हो सकता है तथा ऐसे मामलों की सूचना संबंधित जिला न्यायाधीश द्वारा रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जानी चाहिए।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Ex-Capt. Harish Uppal बनाम Union of India (2002) में भी स्पष्ट किया गया था कि अधिवक्ताओं को हड़ताल या न्यायालयों के बहिष्कार का अधिकार नहीं है और न्यायालयों का कार्य बाधित नहीं किया जा सकता।
हाल ही में चर्चित टोल प्लाजा मारपीट प्रकरण में भी सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ताओं के आचरण पर कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि विधिक पेशे की गरिमा बनाए रखना प्रत्येक अधिवक्ता का दायित्व है। न्यायालय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया से अपेक्षा व्यक्त की कि यदि किसी अधिवक्ता का आचरण पेशे की गरिमा के प्रतिकूल पाया जाए तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी पक्ष की पैरवी करने वाले अधिवक्ता को डराना, धमकाना या हिंसा का शिकार बनाना कानून के शासन पर सीधा आघात है।
ऐसे में जालौन में न्यायालय के बहिष्कार को लेकर उठे विवाद ने कई कानूनी प्रश्न खड़े कर दिए हैं। एक ओर बार एसोसिएशन अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहा है, वहीं दूसरी ओर न्यायालय उपलब्ध वैधानिक शिकायत निवारण तंत्र, हाईकोर्ट के आदेशों और सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के पालन पर जोर दे रहा है।
Orai, Jalaun | Aug 4, 2026