
भाजपा में बढ़ती गुटबाजी: क्या अनुशासन की पहचान वाली पार्टी भी कांग्रेस के पुराने रास्ते पर?
बावल की 30 जून रैली से लेकर बड़े नेताओं के मंचों तक उभरे मतभेदों ने बढ़ाई राजनीतिक चर्चा
‘व्यक्ति से बड़ा संगठन’ की विचारधारा के सामने खड़ा हो रहा व्यक्तिगत खेमेबाजी का सवाल
मुख्यमंत्री, प्रदेश नेतृत्व और राष्ट्रीय अध्यक्ष की मौजूदगी में अनुशासन पर उठने लगे गंभीर सवाल
कल होने वाली बावल रैली पर टिकी राजनीतिक नजरें, क्या पार्टी एकजुटता का दे पाएगी संदेश?
रेवाड़ी। हरियाणा सहित देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को लंबे समय तक एक ऐसे राजनीतिक दल के रूप में जाना जाता रहा है, जिसकी सबसे बड़ी पहचान मजबूत संगठन और कठोर अनुशासन रही है। पार्टी के भीतर मतभेद होते थे, विचारों में अंतर भी होता था, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर संगठनात्मक मर्यादा को चुनौती देना अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता था। भाजपा की राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा आधार यही रहा कि व्यक्ति से बड़ा संगठन और संगठन से बड़ा विचार माना गया।
मगर अब बदलते राजनीतिक घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या भाजपा भी धीरे-धीरे उसी रास्ते की ओर बढ़ रही है, जिस पर कभी कांग्रेस चली थी? क्या बढ़ती व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, नेताओं के अलग-अलग शक्ति केंद्र और सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाली खींचतान भविष्य में भाजपा की संगठनात्मक मजबूती को प्रभावित कर सकती है?
इन सवालों का जवाब केवल राष्ट्रीय राजनीति में नहीं, बल्कि हरियाणा के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों में भी तलाशा जा रहा है। विशेष रूप से 30 जून को बावल में आयोजित ‘खेत बचाओ’ रैली के बाद और अब कल होने वाली बावल रैली को लेकर राजनीतिक हलकों की निगाहें और अधिक गहराई से इस पूरे घटनाक्रम पर टिक गई हैं।
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कांग्रेस की कमजोरी से भाजपा को क्या सबक लेना चाहिए?
कांग्रेस लंबे समय तक देश और कई राज्यों की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक ताकत रही। उसका विशाल संगठन, अनुभवी नेतृत्व और व्यापक जनाधार उसकी बड़ी ताकत थे। लेकिन समय के साथ पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी, नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई, क्षेत्रीय शक्ति केंद्रों का उभरना और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने संगठन को कमजोर किया।
कई बार पार्टी की सामूहिक रणनीति से ज्यादा अलग-अलग नेताओं की अपनी राजनीतिक लाइनें चर्चा में रहीं। परिणाम यह हुआ कि संगठनात्मक अनुशासन कमजोर पड़ा और मतभेद सार्वजनिक होते चले गए।
आज भाजपा के सामने भी एक अलग लेकिन कुछ हद तक मिलती-जुलती चुनौती दिखाई देने लगी है। भाजपा में पिछले वर्षों के दौरान कांग्रेस सहित अन्य दलों से बड़ी संख्या में नेता शामिल हुए। इनमें कई प्रभावशाली और जनाधार वाले चेहरे भी रहे, जिन्होंने पार्टी के विस्तार और चुनावी मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या दूसरे दलों से आए नेताओं के साथ उनकी पुरानी राजनीतिक कार्यशैली और गुटीय संस्कृति भी भाजपा के भीतर प्रवेश कर रही है? यदि ऐसा है तो यह भाजपा के पारंपरिक संगठनात्मक संस्कारों के लिए चुनौती बन सकता है।
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भाजपा की सबसे बड़ी ताकत रही है अनुशासन
भाजपा में सामान्य कार्यकर्ता से लेकर बड़े नेता तक पार्टी नेतृत्व के निर्णय को सर्वोपरि मानने की परंपरा रही है। मतभेदों को संगठन के भीतर रखना और अंतिम निर्णय के बाद सामूहिक रूप से पार्टी लाइन के साथ खड़ा होना उसकी राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा रहा है।
इसी अनुशासन के कारण भाजपा ने कई राज्यों में मजबूत संगठन खड़ा किया। पार्टी के कार्यकर्ता को यह संदेश दिया जाता रहा कि कोई भी नेता संगठन से ऊपर नहीं है।
लेकिन अब यदि बड़े नेताओं के बीच मतभेद सार्वजनिक मंचों, कार्यक्रमों, बयानों और शक्ति प्रदर्शन के रूप में दिखाई देने लगें तो उसका सीधा असर नीचे तक जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष या राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे शीर्ष नेतृत्व के सामने ही अनुशासन की मर्यादा टूटती दिखाई दे तो सामान्य कार्यकर्ताओं को क्या संदेश जाएगा?
कार्यकर्ता संगठन से सीखता है। यदि ऊपर के स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक लाइनें खींची जाएंगी, तो नीचे भी कार्यकर्ता अपने-अपने नेताओं और खेमों के आधार पर बंट सकते हैं। यही किसी भी बड़े राजनीतिक संगठन के लिए सबसे चिंताजनक स्थिति होती है।
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30 जून की बावल रैली बनी बड़ा उदाहरण
भाजपा में अंदरूनी खींचतान को लेकर चर्चाओं का सबसे प्रमुख उदाहरण 30 जून को बावल के चौधरी चरण सिंह कृषि महाविद्यालय में आयोजित ‘खेत बचाओ’ रैली को माना जा रहा है।
इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे बड़े नेता मौजूद थे। इतना बड़ा सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रम होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर पार्टी के कई प्रमुख चेहरों की गैरमौजूदगी प्रदेशभर में चर्चा का विषय बनी।
स्थानीय सांसद, विधायक और संगठन से जुड़े कुछ प्रमुख पदाधिकारियों की कार्यक्रम से दूरी को राजनीतिक हलकों में केवल सामान्य अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखा गया। इसके पीछे असंतोष, अंदरूनी खींचतान और शक्ति संतुलन की राजनीति को लेकर भी चर्चाएं होती रहीं।
सवाल यह है कि जब पार्टी के सर्वोच्च स्तर के नेता किसी कार्यक्रम में मौजूद हों, तब स्थानीय स्तर के प्रभावशाली नेताओं की अनुपस्थिति क्या केवल संयोग मानी जाए या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश भी हो सकता है?
राजनीति में अक्सर मौजूदगी से ज्यादा गैरमौजूदगी संदेश देती है। यही कारण है कि 30 जून की रैली के बाद भाजपा की अंदरूनी राजनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं।
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कार्रवाई नहीं हुई तो क्या गया गलत संदेश?
इस पूरे घटनाक्रम का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि कार्यक्रम के बाद सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई बड़ी संगठनात्मक कार्रवाई या कड़ा संदेश दिखाई नहीं दिया, जिससे यह स्पष्ट हो कि पार्टी अनुशासन के मामले में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगी।
यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है—
यदि पार्टी के बड़े कार्यक्रम में अनुशासन और सामूहिकता की भावना को चुनौती मिलने के बाद भी कोई स्पष्ट कार्रवाई न हो, तो भविष्य में अनुशासन कैसे कायम रहेगा?
राजनीति और संगठन में कार्रवाई केवल किसी व्यक्ति को दंडित करने के लिए नहीं होती, बल्कि उसका संदेश पूरे संगठन तक जाता है। यदि संगठन समय रहते यह संदेश देने में सफल रहे कि नेता चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, पार्टी और संगठन से ऊपर कोई नहीं है, तो अनुशासन मजबूत होता है।
लेकिन यदि यह धारणा बनने लगे कि प्रभावशाली नेताओं के लिए अलग नियम हैं और सामान्य कार्यकर्ताओं के लिए अलग, तो संगठनात्मक असंतुलन पैदा हो सकता है।
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी यही है कि वह अपने पुराने संगठनात्मक संस्कारों को कितना मजबूत रख पाती है।
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मतभेद और गुटबाजी में बड़ा अंतर
लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है। किसी भी राजनीतिक दल में सभी नेता हर मुद्दे पर एक जैसी राय नहीं रख सकते। विचारों में अंतर होना संगठन की कमजोरी नहीं, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा भी हो सकता है।
लेकिन स्थिति तब गंभीर होती है जब—
मतभेद व्यक्तिगत वर्चस्व की लड़ाई बन जाएं।
नेता संगठन की सामूहिक रणनीति से अलग अपनी राजनीतिक लाइन खींचने लगें।
कार्यकर्ता पार्टी के बजाय अलग-अलग नेताओं के खेमों में बंटने लगें।
सार्वजनिक मंच शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाएं।
कार्यक्रमों में उपस्थिति और अनुपस्थिति राजनीतिक संदेश देने के लिए इस्तेमाल होने लगे।
अनुशासन तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने में संगठन कमजोर दिखाई दे।
यहीं से मतभेद गुटबाजी में बदलते हैं।
और इतिहास गवाह है कि किसी भी राजनीतिक दल को बाहरी विरोधी दल से जितना नुकसान नहीं होता, कई बार उससे कहीं अधिक नुकसान उसके भीतर की लड़ाई से होता है।
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कांग्रेस से आए नेताओं पर उठ रहे सवाल
भाजपा में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कांग्रेस और अन्य दलों से बड़ी संख्या में नेताओं का प्रवेश हुआ है। इनमें कई ऐसे चेहरे शामिल हैं जिनका अपने क्षेत्रों में मजबूत राजनीतिक प्रभाव रहा है।
Rewari, Rewari | Aug 23, 2026